
तेरी राहों में जलाकर उम्र के सारे दीए,
हम अँधेरों से लड़ते हुए मुस्कुराते ही रहे।
तू न आया कभी मेरी दुआओं के नगर में,
फिर भी तेरे नाम के गीत गुनगुनाते ही रहे॥
हर सुबह तेरे ख़यालों के उजाले साथ थे,
हर शाम तेरी यादों का धुआँ दिल में रहा।
तू बेख़बर रहा मेरे टूटते अरमानों से,
मगर तेरा ही सपना मेरी आँखों में रहा॥
चाहा था कि कभी तू भी पुकारे प्यार से,
पर तेरी ख़ामोशी ने ऐसा फ़ैसला लिख दिया।
मेरे जज़्बात को अपने दिल का सहारा न दे,
हर उम्मीद को वक़्त की धारा में बहा दिया॥
अब न कोई शिकायत है, न कोई गिला तुझसे,
तेरी ख़ुशियों की दुआ आज भी लब पर है।
हम तो चल पड़े हैं दूर सितारों की बस्ती में,
जहाँ न दर्द का साया ,न इंतज़ार का सफ़र है॥
अगर कभी तन्हाई में मेरा ख़याल आ जाए,
तो समझना किसी रूह ने तुझे फिर याद किया।
जिसने चाहा था तुझे अपनी आख़िरी साँस तक,
उसने चुपचाप मोहब्बत का हक़ अदा किया॥
स्वरचित मौलिक अभिव्यक्ति
सुमन बिष्ट, नोएडा




