
बड़ी आस लेकर,
जिन्हें कुर्सी पर बिठाया था।
लाएँगे बदलाव हम,
कह कर उन्होंने हमें ,
सब्ज़ बाग दिखला कर,
झूठे वादों से फुसलाया था।
सत्ता पाकर भूले सब कुछ,
बाँट रहे रेवड़ियाँ अपनों को,
स्वार्थ हैं इनके हिमालय,
मूल्यों के लाले हो गए हैं।
जनता से अब नहीं,
इनका कोई वास्ता।
उल्लू अपना सीधा कर,
वो नाप चले रास्ता।
मेले,ठेले,सीमेंट,चारा,
पर्वत,धरती,जंगल सारा,
ये सब गए निगल।
पेट अब भी खाली पड़ा,
आत्मा हो रही विकल।
ऊँट के मुँह में ये अब,
जीरे के निवाले हो गए हैं।
चोंच और दाने का फ़ासला,
दिनों- दिन बढ़ता ही गया।
ये फूलते-फलते रहे,
देश सिकुड़ता गया।।
किए बुलंद नफरत के नारे,
चूर हो गए सपन सारे,
वीरान हुए सारे नज़ारे,
मटमैलै गंगा के धारे,
रसातल हवाले हो गए हैं।
हर आग पर रोटियांँ,
सेंकने में माहिर हैं ये।
रावणराज में सोते कुंभकर्ण,
जगज़ाहिर हैं ये।
जूं न रेंगे कान पर इनके,
अंदाज़ निराले हो गए हैं।
चल रहे संसद में जूते,
तू-तू मैं-मैं का शोर है।
कौन है किसको पटकता,
घमासान ये घोर है।
हाथ में कालिख लिए,
लिए मुँह में गालियाँ।
चौराहों पर फूँक पुतले,
जनता बजाए तालियाँ।
जल्द सिखाएगी सबक,
कुर्सी से देगी पटक,
पहचान ले औकात अपनी,
बुलंद ये नारे हो गए हैं।
वीणा गुप्त
नई दिल्ली



