
बरसे बूंँद -बूंँद कर
पानी।
झम-झम बरसो बरसा रानी ।
भूल हुई गलती हम माने ।
थे वे अज्ञानी दीवाने।।
बिन सोचे कारज कर जाते।
देख निष्कर्ष थे पछताते।।
पेड़ उखाड़े गेह बनाए।
आफत अपने सिर पर ढा़ए।।
बूढ़ पुराने थे समझाएं।
बात समझ में कम ही आए ।
बोझ रोग का तन पर ढोते।
बैठ किनारे चुप- चुप रोते।।
बिन माली के यह थल सूना ।
हरियाली भरे कई गूना ।।
कोई नहीं यहांँ कृषि जैसा ।
प्रेम लुटाते भू पर ऐसा ।।
देख -देख भगवन मुस्काते।
छाँव घनेरा ज्यों सुख पाते।।
प्रथम पूजलो तरु को प्यारे ।
वास करें हैं देव हमारे।।




