साहित्य

हम भ्रष्टन के

वीणा गुप्त 

हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे,

रंग रूप आचार एक सा,

एक से हैं सुर ताल हमारे।

 

हर तिकड़म में हम माहिर हैं,

बेशर्मी में  जग जा़हिर हैं,

गिरगिट हमें देख शर्माए।

नियम हमारे मन माफिक हैं,

जिसको चाहें पार उतारें।

 

सच से हमें परहेज बहुत है,

झूठ से हम लबरेज़ सदा ।

मुर्दों को हम कफन बेचते,

ज़िंदों को हम नंगा मारें।

हम  भ्रष्टन के भ्रष्ट  हमारे।

 

हम मान- अपमान से ऊपर,

मजहब और इंसान से ऊपर,

पैसा ही भगवान हमारा,

नहीं किसी से भाई चारा,

करें बुलंद नफ़रत के नारे,

हम भ्रष्टन के भ्रष्ट  हमारे।

 

जो भी आड़े हमारे आए,

वो हमसे फिर पार न पाए।

साम -दाम, दंड- भेद लिए हम,

सभी सूरमा हमसे हारे।

काम तमाम करें हम सारे।

हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे ।

 

सब दुष्ट शरण हमारी आएं,

सदा हमारी जय- जय गाएं

दया दृष्टि बस हमरी चाहें,

न्याय -धर्म के सब रखवारे,

सर्वस्व अपना हम पर वारें।

हम भ्रष्टन के भ्रष्ट हमारे।

 

वीणा गुप्त

नई दिल्ली

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