
मेरी छोटी सी है नाव, तेरे धूल भरे हैं पाँव,
कैसे बिठाऊँ तुझे नाव में, मुझे डर लागे…
गंगा की गहरी धार, नैया मेरी बेकरार,
डर लागे छूते ही, पत्थर न बन जाव…
सुना तेरे चरणों से, पत्थर भी तर जाते,
अहिल्या की कथा यही, सबको सुनाव…
मेरी छोटी सी है नाव…
राम मुस्काए तब, बोले हँसकर सब,
भय त्याग दे केवट, साथ सिया रानी हैं…
सेवा का दे अवसर, धो लूँ तेरे ये चरण,
फिर पार लगा दूँगा, ये प्रीति निशानी है…
मेरी छोटी सी है नाव…
केवट ने धोए पग, भीग गया उसका हृदय,
भक्ति में डूबा मन, आँखों में पानी है…
नैया चली धीरे, राम सिया संग तीरे,
धन्य हुआ जीवन, ये प्रेम कहानी है…
मेरी छोटी सी है नाव…
अब तो बिठाऊँ प्रभु, पार लगाऊँ प्रभु,
मन में भक्ति की ज्योति, जगमगानी है…
नयनों से बहती धारा, मन में मधुर धुन,
जीवन की हर श्वास, तेरी ही कहानी है…
मेरी छोटी सी है नाव…
जब दी उतराई प्रभु, मुद्रा रखी कर में,
केवट ने जोड़ कर हाथ, विनती ये मानी है—
“हम भी हैं नाविक प्रभु, तुम भी हो तारनहार,
आज मैंने पार किया, तुम पार लगाना जी…
मैं तो लघु सेवक हूँ, लोभ नहीं धन का,
बस चरणों की धूल मिले, भाग्य जगाना जी…
जब हो भवसागर में, डूबे ये जीवन नौका,
तब हाथ पकड़ लेना, पार लगाना जी…”
मेरी छोटी सी है नाव, तेरे धूल भरे हैं पाँव,
अब तो बिठाऊँ मैं प्रभु, पार लगाऊँ मैं……
स्वरचित
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार



