
वसुधैव कुटुम्बकम्’ कहने वाला देश आज अपनी ही धरती को बीमार देख रहा है। नदियाँ काली हो रही हैं, हवा जहरीली और जंगल सिमट रहे हैं। ऐसे समय में कुछ लोग दीवार बनकर खड़े हैं। इन्हें न पद की चाह है, न पुरस्कार का मोह। ये हैं पर्यावरण संरक्षण के नायक-नायिका। इनके लिए प्रकृति ‘संसाधन’ नहीं, ‘संस्कार’ है।
1. नायक की परिभाषा बदल रही है
पहले नायक वो था जो युद्ध जीतता था। आज नायक वो है जो पेड़ बचाता है। नायक वो किसान है जो मेड़ पर नीम लगाता है, यह जानते हुए भी कि उसकी छाया से दो बिस्वा फसल कम होगी। नायिका वो माँ है जो बच्चे को टिफिन स्टील के डिब्बे में देती है और प्लास्टिक रैपर को ना कहती है। नायक वो ऑफिस वाला युवक है जो 8 किमी साइकिल से जाता है ताकि एक लीटर पेट्रोल बचे। नायिका वो दादी है जो तुलसी में रोज़ जल चढ़ाती है और पोते को बताती है कि ‘ये ऑक्सीजन की फैक्ट्री है बेटा’।
2. इतिहास के पन्नों से: बलिदान की परंपरा
1730, राजस्थान। खेजड़ली गाँव। राजा के सैनिक महल बनाने हेतु खेजड़ी के पेड़ काटने आए। अमृता देवी बिश्नोई ने पेड़ से लिपटकर कहा – ‘सिर साटे रूंख रहे तो भी सस्तो जाण’। उनके साथ 362 बिश्नोइयों ने प्राण दे दिए, पर पेड़ नहीं कटने दिए। यही ‘चिपको’ का पहला अध्याय था।
1973 में गौरा देवी ने रैंणी गाँव में ठेकेदारों को ललकारा। महिलाएं पेड़ों से चिपक गईं। नारे लगे – ‘क्या हैं जंगल के उपकार, मिट्टी, पानी और बयार’। सरकार को झुकना पड़ा। ये थीं असली नायिकाएं – हाथ में कुल्हाड़ी नहीं, ममता थी।
3. आधुनिक भारत के मौन तपस्वी
जादव ‘मोलाई’ पायेंग:
असम का ये मिसिंग जनजाति का युवक 1979 से ब्रह्मपुत्र के बंजर टापू पर पेड़ लगा रहा है। अकेले। आज वहाँ 550 हेक्टेयर का ‘मोलाई फॉरेस्ट’ है। बाघ, गैंडे, हाथी, हिरण सब रहते हैं। पद्मश्री मिला तो बोले, ‘जंगल मेरा इनाम है’।
सालुमरदा थिमक्का:
कर्नाटक की 113 वर्षीय ये निरक्षर महिला। संतान न होने का दु:ख पेड़ लगाकर भुलाया। पति के साथ मिलकर 385 बरगद के पेड़ लगाए और 60 साल तक उनकी देखभाल की। आज हाईवे 4 उनकी छाया में है। लोग उन्हें ‘वृक्षमाता’ कहते हैं।
राजेंद्र सिंह:
‘जलपुरुष’। राजस्थान के अलवर में ‘जोहड़’ यानी पारंपरिक तालाब पुनर्जीवित किए। 11 नदियाँ फिर बहने लगीं। 1000 गाँवों में पानी आया। बंदूक नहीं चलाई, फावड़ा चलाया।
तुलसी गौड़ा:
कर्नाटक की हलक्की आदिवासी। 60,000 से ज़्यादा पेड़ लगाए। हर पेड़ की माँ की तरह देखभाल। वन विभाग इन्हें ‘एनसाइक्लोपीडिया ऑफ फॉरेस्ट’ कहता है। पद्मश्री 2021।
4. शहरों के गुमनाम नायक-नायिका
आफरोज शाह, मुंबई:
वकील हैं। 2015 में वर्सोवा बीच 5 फुट कचरे में दबा था। इन्होंने झाड़ू उठाई। धीरे-धीरे 20,000 स्वयंसेवक जुड़े। 5.3 मिलियन किलो कचरा निकाला। आज कछुए फिर अंडे देने आते हैं। UN ने ‘चैंपियन ऑफ द अर्थ’ कहा।
‘बर्तन बैंक’ वाली दमयंती, पुणे:
शादी में 1000 थर्माकोल प्लेटें? नहीं। ये आंटी 2000 स्टील की थाली-कटोरी मुफ्त देती हैं। बस धोकर लौटा दो। 5 साल में 15 लाख पीस प्लास्टिक बचा।
दिल्ली के ‘प्लॉगर्स’:
Ripu Daman Bevli ने शुरू किया। लोग जॉगिंग करते हुए कचरा उठाते हैं। ‘फिट रहो, इंडिया स्वच्छ करो’। अब 50 शहरों में हैं।
चंडीगढ़ के ‘प्रूनिंग वाले अंकल’:
75 साल के जसवंत सिंह। हर रविवार साइकिल पर आरी लेकर निकलते हैं। सड़क पर झुकी टहनियाँ छाँटते हैं ताकि आँधी में पेड़ न गिरे। न फोटो, न नाम।
5. नारी और प्रकृति: जन्मजात रिश्ता
महिलाएं स्वभाव से संरक्षक हैं। उत्तराखंड में ‘महिला मंगल दल’ जंगल की आग पहली बुझाती है। पिपलांत्री, राजस्थान में लड़की पैदा होने पर 111 पेड़ लगते हैं। आज वहाँ का भूजल स्तर 3 मीटर बढ़ गया। ‘गुलाबी गैंग’ अवैध खनन रोकती है। घर में सब्जी के छिलकों से खाद बनाना, पुरानी साड़ी से थैला सिलना – ये छोटे काम ही बड़ी नायिकाएं करते हैं। वंदना शिवा कहती हैं, ‘बीज बचाना, देश बचाना है’। उन्होंने ‘नवधान्य’ से 3000 बीज बैंक बनाए।
हमारे पास प्लैनेट-B नहीं है। यह धरती ही एकमात्र घर है। पर्यावरण संरक्षण का कोई विकल्प नहीं है, बल्कि यह अनिवार्यता है।
© डॉ अर्जुन गुप्ता ‘गुंजन’
प्रयागराज, उत्तर प्रदेश




