
अब तो सुंदर धरती सूनी
होती जाती दिन पर दिन
उजड़ रहे हैं रैन बसेरे
कहां बनायें पक्षी घर
बढ़ चली है रवि की गर्मी
हुई चांदनी शीतल कम
मिट गया है प्रेम का रिश्ता
किसे बनाएं अपना हम
सोच रहे हम खड़े आज यूं
कहां गये हो मानव तुम
डॉ.उमा रानी दुबे
जयपुर, राजस्थान




