
जब विदा होती है बेटी, आँखें भर-भर आती हैं,
बचपन की वो भोली यादें, रह-रहकर तड़पाती हैं।
सूना कर चली जो आँगन, वो बाबुल की दुलारी है,
पर नए घर की चौखट पर, अब जिम्मेदारी भारी है।
खाली हाथ न जाए लाडो, माँ आँचल को फैलाती है,
सजल नयनों से ममता की, वो अनमोल रस्म निभाती है।
बाँधकर साड़ी के पल्लू में नेह का धागा गहरा,
भरती है माँ खोंइछा, अपनी दुआओं का देकर पहरा।
मुट्ठी भर अक्षत देकर, माँ सुख-शांति का वरदान देती है,
सदा हरा-भरा रहे परिवार तेरा, हरी दूब से ये पैगाम देती है।
हल्दी की छुअन और सुपारी से, सौभाग्य का आशीष जगमगाता है,
सिंदूर की लाली से सदा, अखंड सुहाग का अटूट रिश्ता महकता है।
साथ में रखे वो चंद सिक्के, समृद्धि का अटूट विश्वास जगाते हैं,
कि कमी न हो कभी कुछ भी, माँ के ये जज्बात बताते हैं।
ये सिर्फ सामान की पोटली नहीं, माँ के धड़कते दिल की कहानी है,
बेटी की खुशहाल जिंदगी के लिए, एक माँ की अनमोल निशानी है।
बिहार, झारखंड या हो पूर्वांचल, नाम इसके भले बदल जाते हैं,
पर ओढ़नी, आँचल या खोंइछा में, माँ के भाव नहीं बदल पाते हैं।
लाडो तू जहाँ भी कदम रखे, वहाँ खुशियों का ही संसार रहे,
तेरा जीवन सदा ही माँ के आशीर्वाद, समृद्धि और प्यार से सराबोर रहे।
लेखिका ज्योति बरनवाल
नवादा (बिहार)




