
अभी शपथ हम लेते मिलकर पर्यावरण बचाने को।
हरियाली चहुंँ ओर सजी हो, सुंदर प्रकृति बनाने को।
हवा मिले जब ठंडी ताजी, जीवन में आए खुशहाली।
हरी-भरी हो धरती माता, खेतों में हो हरियाली।।
मातृभूमि के कण-कण में भी, पौधे चलो लगाने को।
बीज लगा पावन मिट्टी में, चलो पेड़ उगाने को।।
हुई अंकुरित जब नव पल्लव , कलियांँ लगती मुस्काने।
गुलशन में जब फूल खिलेंगे, फिर से प्रकृति सजाने को।।
चली बयार अब तो पुरवाई,खुश्बू फैली मिट्टी की।
हुई फिजाएँ रंगीन प्रकृति की फिर से स्नेह लगाने को।।
बंद करो सब पेड़ प्रकृति को, अब तो क्षति पहुँचाने को।
चलो साथियों पेड़ लगाओ, हर घर अलख जगाने को।।
बने तभी वातावरण खुशनुमा, मन को हर्षित कर जाए।
आओ मिलकर साथ चले हम, सुंदर धरा सजाने को।
डॉ जगदीश नारायण गुप्त
“जगदीश”
बनारस✍️✍️




