साहित्य

प्रिय

सीता सर्वेश त्रिवेदी

जानता हूँ, तुमने मेरी बातों पर विश्वास किया था,

मेरे हर वादे को अपने दिल में सजाया था।

मैं कहता था कि तुमसे बहुत प्रेम करता हूँ,

तुम्हारे बिना एक पल भी नहीं रह सकता हूँ।

 

लेकिन जब समय ने मुझसे उत्तर माँगा,

मैं अपने ही शब्दों से डर गया।

तुमने जिस प्रेम को सच समझा,

मैं उसे निभाने का साहस न जुटा सका।

 

यह सच है कि मैंने कहा था—

“मैं तो मज़ाक कर रहा था, यूँ ही बोल दिया था।”

पर यह मेरे दिल की आवाज़ नहीं थी,

यह मेरी कमजोरी और भय की जुबान थी।

 

तुम्हारे दिल के पास आकर,

तुम्हारे सपनों में जगह बनाकर,

फिर यूँ मुड़ जाना आसान नहीं था,

पर सच का सामना करने का साहस भी मुझमें नहीं था।

 

आज जब तुम्हारी खामोशी सुनता हूँ,

तो अपने हर शब्द का बोझ महसूस करता हूँ।

तुम्हारे प्रश्नों के उत्तर मेरे पास नहीं,

बस पछतावे की लंबी रातें हैं।

 

अगर मेरे कारण तुम्हारी आँखें नम हुईं,

तो उस दर्द का दोषी मैं ही हूँ।

प्रेम था या नहीं, यह तो समय जाने,

पर तुम्हारे विश्वास को तोड़ने का अपराध मेरा है।

 

हो सके तो मुझे क्षमा कर देना,

हालाँकि मैं जानता हूँ कि कुछ घाव

केवल समय भरता है।

तुम्हारे हिस्से की खुशियाँ तुम्हें मिलें,

यही मेरी अंतिम प्रार्थना है।

सीता सर्वेश त्रिवेदी

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