
सरयू को छोड़कर, मुँह को मोड़कर,
पिता-वचन निभाने , वन को जाइए।
संग सिया सुशील हैं, लक्ष्मण भी अधीर हैं,
त्याग और तपस्या का, पाठ ये पढ़ाइए॥
वन में गमन किया, धर्म का वरण किया,
विपदा के अँधेरों में, दीप-सा जगाइए।
ऋषियों के हितकारी, दीनों हित उपकारी,
मर्यादा श्रीराम जी को, शीश ही नवाइए॥
चित्रकूट के धाम में, पंचवटी थी ग्राम में,
प्रेम औ सदाचार का, भाव ही बसाइए।
रावण के घमंड को, अधर्म भरे स्तंभ को,
धनुष-बाण शक्ति से, धूल में मिलाइए॥
भक्त जनों के प्राण हैं, करुणा की तो खान हैं,
राम-नाम अमृत को, नित्य ही पिलाइए।
जीवन के हर पल,अंतर्मन बसे बल,
भाव भरे प्रणाम से, राम को रिझाइए॥
स्वरचित
डाॅ सुमन मेहरोत्रा ‘सुरभि’
मुजफ्फरपुर, बिहार




