साहित्य

नारी आत्म सम्मान

विनीता चौरासिया

अब टकराती हर प्रस्तर से, कोई मौन रुदन स्वीकार्य नहीं

अबला नहीं वो सबला है, अपमान अब शिरोधार्य नहीं
बना अर्धांगिनी लाए जिसे, गर मान न मन से दे पाए
तो आज उपानह बनकर, करना कोई । गृहकार्य नहीं ।

ये विकसित देश की नारी निकल पड़ी, तम के गलियारों से
नव कीर्तिमान स्थापित कर, मिलती है नित उजियारों से
रच के नव इतिहास, हास-परिहास न स्वयं का होने दे
किया स्वर्णिम आगाज़ उसी ने, निकल पड़ी चौबारों से ।

तोड़ा हर रूढ़ि को, अपनी हिम्मत के हथियारों से
न्याय की खातिर लड़ती है, कुछ छिपे हुए गद्दारों से
पिया बिना है अधूरी मगर, जुल्म और अब सह न सके
स्वयं की रक्षा करती, तीक्ष्ण बुद्धि के प्रहारों से ।

*विनीता चौरासिया*
*शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश*

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