
अब टकराती हर प्रस्तर से, कोई मौन रुदन स्वीकार्य नहीं
अबला नहीं वो सबला है, अपमान अब शिरोधार्य नहीं
बना अर्धांगिनी लाए जिसे, गर मान न मन से दे पाए
तो आज उपानह बनकर, करना कोई । गृहकार्य नहीं ।
ये विकसित देश की नारी निकल पड़ी, तम के गलियारों से
नव कीर्तिमान स्थापित कर, मिलती है नित उजियारों से
रच के नव इतिहास, हास-परिहास न स्वयं का होने दे
किया स्वर्णिम आगाज़ उसी ने, निकल पड़ी चौबारों से ।
तोड़ा हर रूढ़ि को, अपनी हिम्मत के हथियारों से
न्याय की खातिर लड़ती है, कुछ छिपे हुए गद्दारों से
पिया बिना है अधूरी मगर, जुल्म और अब सह न सके
स्वयं की रक्षा करती, तीक्ष्ण बुद्धि के प्रहारों से ।
*विनीता चौरासिया*
*शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश*




