
करती सारे बबाल दो जून की रोटियाँ
कर देती हैं बेहाल दो जून की रोटियाँ।
पसीना सान के तब सनता है आटा
पाँव के छालों के अंगारो में तब पकती हैं रोटियाँ।
कभी धूप कभी छाँव सब सहती है रोटियाँ
कलपते पेट के भूचालों में बहती हैं रोटियाँ।
- डॉ नवनीता दुबे नूपुर©®✍️मंडला,मप्र,मौलिक।




