साहित्य

पिता

डॉ अपराजिता

ता केवल एक शब्द नहीं,

जीवन का सबसे मजबूत आधार हैं।

वह दीपक हैं, जो स्वयं जलकर

बच्चों को उज्ज्वल करते हैं।

छोटे कदमों से चलना सीखते हैं,

उनकी उँगली बनती सहारा ।

जीवन की राह कठिन हो जब,

उनकी सीख किनारा बनती है।

पिता की आँखों में सपने होते हैं,

पर वे अपने सपनों से पहले

बच्चों के सपनों को उड़ान देते हैं।

अपनी इच्छाओं को पीछे छोड़कर

उनका खुशियों का संसार सजाते ।

उनके मौन में प्रेम का अथाह सागर होता है।

उनकी डाँट में चिंता छिपी होती है,

और उनकी सख्ती में भविष्य की सुरक्षा।

सुबह की पहली किरण से

वे अपने कर्तव्यों की राह पर निकल पड़ते ।

दिनभर संघर्ष की धूप सहते हैं,

परिवार में सुख की छाँव बनी रहे।

थकान उनके कदमों को रोक नहीं पाती,

चिंताएँ उनके चेहरे पर टिक नहीं पातीं।

वे हर दर्द को मुस्कान में छिपाकर

परिवार के लिए जीते

माँ ममता का सागर हैं,

तो पिता साहस का पर्वत हैं।

माँ भावनाओं की भाषा हैं,

तो पिता कर्म और संघर्ष की गाथा हैं।

उनके उपकारों का ऋण

शब्दों में कभी चुकाया नहीं जा सकता।

उनके प्रेम की गहराई को

किसी तराजू में तौला नहीं जा सकता।

ईश्वर से बस यही प्रार्थना है,

हर पिता का सम्मान बना रहे।

उनके जीवन में सुख और स्वास्थ्य हो,

उनके चेहरे पर मुस्कान सदा खिली रहे।

पिता हैं तो हौसला है,

पिता हैं तो विश्वास है।

पिता हैं तो जीवन की हर राह पर

सफलता का आभास है।

पिता हैं तो घर, घर है,

जीवन में हर प्रकाश है।

 

डॉ अपराजिता  शर्मा

रायपुर

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