
समत्वं योग उच्यते
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योग शब्द का सामान्य अर्थ जुड़ना, मिलना अथवा तादात्म्य स्थापित करना है। इसकी निष्पत्ति संस्कृत भाषा की युज् धातु (दिवादिगण, आत्मनेपदी) से “युज समाधौ” सूत्र के अनुसार होती है। यद्यपि ऋग्वेद में योग शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग प्राप्त होता है, तथापि ईसा से शताब्दियों पूर्व रचित कठोपनिषद् में योग का वही दार्शनिक स्वरूप मिलता है, जो आज व्यापक रूप से प्रचलित है।
कठोपनिषद् कहता है—
“तां योगमिति मन्यन्ते स्थिरामिन्द्रियधारणाम्।
अप्रमतस्तदा भवति योगो हि प्रभवाप्ययौ॥”
(कठोपनिषद् 2.3.11)
अर्थात् इन्द्रियों की स्थिरता और मन की एकाग्रता ही योग है।
महर्षि पतञ्जलि ने योग के स्वरूप, साधना, अष्टाङ्ग मार्ग तथा उसके फल का अत्यन्त वैज्ञानिक विवेचन किया है। आज सम्पूर्ण विश्व में योग की स्वीकार्यता इसी कारण निरन्तर बढ़ रही है। वर्ष 2014 में संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 21 जून को अन्तरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया जाना भारतीय ऋषि-परम्परा के ज्ञान की वैश्विक प्रतिष्ठा का ऐतिहासिक प्रमाण है।
वस्तुतः योग व्यक्ति की सीमित सत्ता का सार्वभौमिक चेतना से तादात्म्य स्थापित करने की साधना है। यह शरीर, मन, बुद्धि और आत्मा के समन्वय की कला है। योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि आत्मिक शक्तियों के जागरण की तपश्चर्या है।
महर्षि पतञ्जलि कहते हैं—
“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः।”
अर्थात् चित्त की वृत्तियों का निरोध ही योग है।
किन्तु श्रीमद्भगवद्गीता योग को केवल समाधि तक सीमित नहीं रखती। भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन को कर्मक्षेत्र में स्थित रहकर योग का उपदेश देते हैं—
“योगस्थः कुरु कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा धनञ्जय।”
अर्थात् योग में स्थित होकर, आसक्ति का त्याग कर कर्म करो।
यहीं गीता आगे कहती है—
“समत्वं योग उच्यते।”
और फिर—
“योगः कर्मसु कौशलम्।”
स्पष्ट है कि गीता के अनुसार योग केवल ध्यान अथवा समाधि नहीं, अपितु समत्व, निष्काम कर्म तथा कर्म में उत्कृष्टता का नाम है। कुछ विद्वान इन परिभाषाओं में श्रेष्ठता का विवाद उपस्थित करते हैं, किन्तु वस्तुतः ये परिभाषाएँ परस्पर विरोधी नहीं, बल्कि एक ही योगदर्शन के विविध आयाम हैं। गीता का समग्र अध्ययन करने पर यह तथ्य स्वतः स्पष्ट हो जाता है।
योग आज वैश्विक पटल पर आरोग्य, मानसिक शान्ति, ध्यान तथा आध्यात्मिक उन्नयन का प्रतीक बन चुका है। जैन परम्परा में ध्यान, बौद्ध दर्शन में समाधि, ईसाई रहस्यवाद में प्रार्थनामय ध्यान तथा सूफी साधना में ईश्वर से एकात्मता—इन सबमें योग का भाव किसी न किसी रूप में विद्यमान है।
ऋषियों ने कहा है—
“शरीरमाद्यं खलु धर्मसाधनम्।”
स्वस्थ शरीर ही समस्त पुरुषार्थों का आधार है। योग इसी आधार को सुदृढ़ करता है।
जहाँ तक योग की विभिन्न मुद्राओं, प्राणायाम तथा ध्यान की अवस्थाओं का प्रश्न है, इसमें कोई सन्देह नहीं कि योग व्यष्टि को समष्टि से जोड़ने की साधना है। मनुष्य अपने भीतर स्थित आत्मशक्ति को जागृत कर मन को एकाग्र करता है। यही एकाग्रता ध्यान का मूल है।
उपनिषद् उद्घोष करते हैं—
“नायमात्मा बलहीनेन लभ्यः।”
आत्मा की प्राप्ति दुर्बल व्यक्ति को नहीं होती। योग शरीर, मन और आत्मा—तीनों को सुदृढ़ बनाता है।
जब मन एकाग्र हो जाता है, तब व्यक्ति अपने उद्देश्य के अतिरिक्त कुछ नहीं देखता। उसका चित्त विचलित नहीं होता। वह भय, शंका, मोह और संशय से मुक्त होकर लक्ष्य की ओर अग्रसर होता है।
महाभारत के युद्धक्षेत्र में अर्जुन सांसारिक मोह के कारण अपने कर्तव्य से विमुख हो रहे थे। तब भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें ज्ञान, भक्ति और अन्ततः कर्मयोग का उपदेश दिया।
वे कहते हैं—
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।
मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते सङ्गोऽस्त्वकर्मणि॥”
यही कर्मयोग का मूल मन्त्र है।योगस्थ होकर किया गया कर्म व्यक्ति को सिद्धि-असिद्धि, जय-पराजय तथा लाभ-हानि से ऊपर उठा देता है। जब मनुष्य स्वयं को परमात्मा में समर्पित कर देता है, तब उसमें निर्भयता उत्पन्न होती है।
गीता कहती है—
“बुद्धियुक्तो जहातीह उभे सुकृतदुष्कृते।”
अर्थात् योगयुक्त बुद्धि वाला मनुष्य शुभ और अशुभ दोनों से ऊपर उठ जाता है।पाश्चात्य जगत ने योग को मुख्यतः आसनों के रूप में अपनाया है। जैन इसे ध्यान, बौद्ध इसे समाधि और पतञ्जलि चित्तवृत्ति-निरोध कहते हैं। वस्तुतः योग का अर्थ केवल आसन नहीं है।
पतञ्जलि का अष्टाङ्ग योग—यम,नियम,आसन,प्राणायाम,प्रत्याहार,धारणा,ध्यान
और समाधि।इन आठ सोपानों के माध्यम से मनुष्य को आत्मसाक्षात्कार की ओर ले जाता है।
यही कारण है कि योग शरीर को स्वस्थ, मन को संयमित तथा आत्मा को प्रकाशित करता है।
योगदर्शन में मंत्रयोग, हठयोग, लययोग तथा राजयोग का विशेष महत्त्व है।मंत्रयोग मंत्रों के उच्चारण, जप और मनन से उत्पन्न दिव्य स्पन्दनों द्वारा मन को एकाग्र करता है।हठयोग सूर्य (ह) और चन्द्र (ठ) स्वरूप इड़ा-पिंगला नाड़ियों का संतुलन स्थापित कर सुषुम्ना का जागरण करता है तथा शरीर और मन को रोग, चिन्ता, नैराश्य एवं अशान्ति से मुक्त करता है।
लययोग चित्त का परमचैतन्य में विलय कराता है।
राजयोग अष्टाङ्ग साधना के माध्यम से व्यष्टि को समष्टि तथा जीव को ब्रह्म से एकाकार कर देता है।
इसी भाव को उपनिषद् कहते हैं—
“अयं तु परमो धर्मो यद्योगेनात्मदर्शनम्।”
योग वस्तुतः मनुष्यत्व का देवत्व में रूपान्तरण है। जब साधक अपने भीतर स्थित दिव्य चेतना का अनुभव करता है, तब उसके लिए असम्भव भी सम्भव हो जाता है।ऋग्वेद की मंगलकामना भी इसी योगभाव को व्यक्त करती है—
“संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।”
अर्थात् साथ चलो, साथ बोलो और अपने मनों को एक करो।
अन्ततः इतना ही कहा जा सकता है कि योग मनुष्य को निरोग, निश्चिन्त, नैराश्य-विहीन तथा लक्ष्याभिमुख बनाता है। यह केवल आध्यात्मिक साधना ही नहीं, बल्कि उत्कृष्ट जीवन-प्रबन्धन का विज्ञान भी है। हमारे प्राचीन ऋषियों की यह अमूल्य धरोहर सम्पूर्ण मानवता के कल्याण का मार्ग प्रशस्त करती है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हम योग को केवल आसन तक सीमित न रखें, बल्कि गीता के संदेश “समत्वम योग उच्चते”को जीवन का मूलमन्त्र बनाते हुए समत्व, निष्काम कर्म, आत्मसंयम और उत्कृष्ट कर्मकौशल को अपने जीवन में उतारें। यही वास्तविक योग है, यही स्वस्थ जीवन का आधार है और यही मानवता के उज्ज्वल भविष्य का सनातन पथ।
“करें योग, रहें निरोग।”
किन्तु इससे भी आगे—”योगस्थ रहें, कर्मपथ पर बढ़ें और जीवन को लोकमंगल का माध्यम बनाएँ।”
— डॉ. उदयराज मिश्र
नेशनल अवार्डी शिक्षक एवं शिक्षाविद्




