साहित्य

संरक्षण एवं दम तोड़ती सरकारी योजनाएं

सुरेशचन्द्र जोशी

हमारे चारों ओर उपलब्ध परिवेश, भले ही वह प्राकृतिक हो या मानव निर्मित, जिसमें हम रहते हैं वह सभी जीव जंतु सांस लेते हैं उसे पर्यावरण कहा जाता है। इसमें जल, वायु, भूमि, पेड़-पौधे और जीव-जंतु सहित वे सभी परिस्थितियां शामिल हैं, जो जीवन के साथ-साथ विकास को भी प्रभावित करती हैं।

पर्यावरण को दो भागों में बांटा जा सकता है:

१. जैविक घटक:

इसमें जीव-जंतु, पेड़-पौधे मनुष्य एवं सूक्ष्मजीव आते हैं।

२. अजैविक घटक:

इसमें पर्यावरण के निर्जीव एवं भौतिक तत्व आते हैं जो जीवन का आधार हैं। इसमें जल, वायु, भूमि एवं प्रकाश सम्मिलित हैं हमारा जीवन पूर्ण रूप से पर्यावरण पर निर्भर रहता है यह हमें पीने के लिए पानी सांस लेने को वायु, खाने के लिए भोजन और रहने के लिए आसरा देता है। वर्तमान समय में प्रदूषण (किसी भी प्रकार का) और वनों की कटाई के कारण पर्यावरण का संरक्षण अत्यंत आवश्यक हो गया है। पर्यावरण संरक्षण आज की सबसे मूलभूत आवश्यकता है। इसके बावजूद धरातल पर बहुत सारी योजनाएं दम तोड़ती नजर आती है।  सरकारी योजनाओं की सफलता जहां एक और गंभीर वैश्विक संकट है वही यह एक स्थानीय मुद्दा भी है। सरकारी योजनाओं की असफलता का कारण इच्छा शक्ति की कमी, प्रशासन का सुस्त होना के साथ ही साथ नागरिकों के भीतर जागरण का अभाव भी है।

प्रमुख सरकारी योजनाएं एवं उनके दम तोड़ने के कार्यों की स्थिति:

भारत सरकार के द्वारा कई महत्वपूर्ण योजनाएं एवं संरक्षण के कार्यक्रम चलाए जा रहे हैं, जो इस प्रकार है:

१. राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजना:

यह नदियों के बढ़ते प्रदूषण को रोकने और जल की गुणवत्ता में सुधार के लिए बनाई गई है।

२. हरित भारत मिशन:

वन के आवरण को बढ़ाने और पारिस्थितिकी तंत्र के संरक्षण के लिए इसे चलाया जा रहा है।

३. राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम:

निम्नीकृत (डिग्रेडेड) वनों के पुनर्जनन हेतु यह कार्यक्रम चलाया जा रहा है।

४. प्रोजेक्ट टाइगर एवं प्रोजेक्ट एलिफेंट:

यह कार्यक्रम लुप्त हो रही प्रजातियों और उनके प्राकृतिक आवासों को संरक्षित करने के लिए भारत सरकार के द्वारा चलाया जाता है।

सरकारी योजनाओं के दम तोड़ने के कारण:

उपरोक्त योजनाएं कागजों में जहां बहुत मजबूत दिखाई पड़ती हैं वास्तविक धरातल पर यह बहुत कमजोर साबित हो रही हैं, इसके मुख्य कारण निम्नलिखित है:

१. फंड का दुरुपयोग और देरी:

कई बार नौकरशाही के चक्कर में इन योजनाओं के लिए समय पर बजट आवंटित नहीं किया जाता और कई बार धांधली के कारण आवंटित बजट का सही प्रकार से उपयोग ही नहीं हो पाता।

२. अवैध खनन एवंअतिक्रमण:

राष्ट्रीय नदी संरक्षण योजनाएं अवैध खनन के साथ ही साथ नदी के तटों पर अतिक्रमण के कारण धरातल पर सही प्रकार से नहीं उतारी जा पातीं।

३. पारदर्शिता का अभाव:

सरकारी योजनाओं में स्थानीय समुदाय एवं नागरिकों की भागीदारी न होने के कारण इन योजनाओं को जमीनी स्तर पर सही प्रकार से लागू नहीं किया जा सकता।

४. विकास बनाम पर्यावरण:

औद्योगीकरण एवं विकास के नाम पर वनों आदि प्राकृतिक संसाधनों का अंधाधुंध दोहन किया जाता है। इसके कारण पर्यावरण संरक्षण के नियमों को ठीक से लागू नहीं किया जा पाता।

५. सख्त कानूनों का अभाव:

सख्त कानून के अभाव में भी प्रदूषण नियंत्रण के कानून का सही प्रकार से पालन नहीं किया जा पाता। पर्यावरण संरक्षण के लिए बनाए गए इन कानूनों का उल्लंघन करने वालों को यह मालूम है कि उल्लंघन करने पर या तो बहुत मामूली सा जुर्माना लगेगा अन्यथा कानूनी दांव-पेचों से भी बचा जा सकता है।

 

सुरेशचन्द्र जोशी, उत्तराखंड, पिथौरागढ़।

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