
पीठ का दर्द हाथों के छाले हँसकर सब सह जाता पिता,
बच्चों की खुशियों की खातिर मेहनत करता जाता पिता।
दिन भर धूप में जलता है वो, बनकर साया अपनों का,
खुद तपन पथ चलता है वो, सच करने ख्वाब बच्चों का।
उंगली पकड़ जिसे चलना सिखाया, वो भी अब रूठ गया,
जिसके लिए थे सपने सजाए, उससे बतियाना छूट गया।
बरसों पसीना बहाता रहा जो, पाई पाई को तरसता है,
अपनों की बेरुखी देखकर, अंदर ही अंदर सिसकता है।
उम्र ढली कमजोर हुआ तन , सहारे को अब तरसता है,
जिसके दम पर कुनबा खाता, क्रोध उसी पर सबका बरसता है।
कापते हाथों से अक्सर वो, पुरानी यादें टटोलता है,
बात नहीं करता कोई उससे, खुद से ही बातें करता है।
तस्वीर धुंधली हो गई बेशक, यादें आज भी जिंदा है,
औलाद के ऐसे बर्ताव पर इंसानियत भी आज शर्मिंदा है।
वक्त बदला बच्चे बदले, भूल गए वो प्यार पुराना,
पिता की बूढ़ी आंखों का, अब रोना है बस एक बहाना।
ए-आँसू ना छोड़ के जाना, साथ निभाना हर मोड़ पर,
यह दर्द बयां है एक पिता का श्वांसो के अंतिम छोर पर
पंडितमुल्क राज “आकाश”
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश




