
छत पर बूंदे जब दस्तक देती हैं
पुराने गाने खुद-ब-खुद बज जाते हैं
चाय की प्याली में भाप उठती हैं
और मन कहीं दूर निकल जाता हैं
भीगना मना है फिर भी भीग लेते हैं
क्योंकि बारिश में बचपन लौट आता हैं
शायद ये बारिश हमे आसमान तक ले जाती हैं
सोचो कभी
अगर तुम बदल पर होते
तुम देख रहे होते ये सब नज़रे कैसा होता
सोचो कभी
अगर तुम पहाड़ों पर होते
ओर हो रही होती बारिश तो कैसा होता
बहुत सुंदर रचना होती वो
जिसके लिए दिल अभी ही उमड़ रहा हैं
देखने को
महसूस करने को
मेरा भी दिल बारिश में भीगने को
कह रहा हैं।।
रिया राणावत
कालीदेवी,झाबुआ(मध्यप्रदेश)




