
अपने ही आंसू और गमे जज़्बात लिखता हूँ,
पसंद नहीं आती जो बात कभी वो बात लिखता हूँ,
टूट जाते है जो ख्वाब हमारे भी, फिर भी एक नया ख्वाब,
लिखता हूँ,
उठती हैं मन मैं जो अनकही बातें, वही सारे अल्फाज़ मैं लिखता हूँ,
ओढ़ लेते हैँ कुछ लोग जो अच्छाई की चदर,उनकी
असलियत कई बार लिखता हूँ,
गुजर जाती है कई रातें अक्सर, जब कभी अपना अलग मिज़ाज़ लिखता हूँ.
सोचता हूँ अक्सर तुम्हारी जगह जो मेरे मन में है,
शायद ही ले पाएगा कोई कभी,
पर खाली जगह खाली नहीं रहतीं कभी,
गए तो तुम हो इस लिए तुम्हारी जगह अब तुम्हारी यादें लिखता हूं।
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✍🏼पंकज एस पाण्डेय, शिकोहाबाद




