
चिंता रहित खेलना खाना, दूर रखा सब उलझन को।
पंख लगाकर दूर गया जो, लौटा दो उस बचपन को।।
मात-पिता की छाया पाकर, बातें सारी मनवाते।
खेल खेलते मिलकर सारे, मिट्टी से मन बहलाते।।
हर पल मस्ती भरी जिंदगी, पाप कपट को कब जाना।
माँगें ज्यों ही पूर्ण हुयी तो, बस उसमें ही इतराना।।
गुल्ली डंडे कभी गोलियाँ, याद करूँ उस जीवन को।
पंख लगाकर दूर गया जो, लौटा दो उस बचपन को।।
अपनी बात मनाने खातिर, बात-बात झगड़ा करते।
अगले ही पल खुश हो जाते, बस देख पिता को सब डरते।।
एक बूँद आँसू जो गिरता, माँ को चैन कहाँ मिलता।
मंदिर-मंदिर दुआ माँगती, हृदय मातु का फिर खिलता।।
दादा दादी सुना कहानी, सिंचन देते उपवन को।
पंख लगाकर दूर गया जो, लौटा दो उस बचपन को।।
वर्षों में दौड़ायी नावें, छप-छप पानी में नाचे।
कभी झूलते बागों में जब, तितली के पीछे भागे।।
गुड्डा-गुड्डी ब्याह रचाते, घर से चीजें ले आते।
मिलकर खाते साथी सारे, बैठ वहीं पर बतियाते।।
‘हिम्मत’ गलियाँ वे चौबारे, सुरभित करते तन-मन को।
पंख लगाकर दूर गया जो, लौटा दो उस बचपन को।।
हिम्मत चौरड़िया प्रज्ञा
कोलकाता,लाडनूँ



