
मन में उमड़े भाव हजारों,
किसको अपना सार लिखूं।
आँसू, मुस्कान, प्रेम, तपस्या,
आखिर मैं क्या लिखूं?
मैं शिव का असीम तप लिखूं,
या कान्हा की मधुर मुरली।
माँ दुर्गा का तेज प्रखर लिखूं,
या गणपति की छवि मंगलमयी।
मैं राम की अनुपम मर्यादा,
या सीता का स्वाभिमान लिखूं।
हनुमत का निष्काम समर्पण,
या भरत का निष्कलुष मान लिखूं।
मैं राधा का निष्छल अनुराग,
या मीरा का विश्वास लिखूं।
प्रेम जहाँ आराधन बन जाए,
ऐसा अनुपम एहसास लिखूं।
मैं निर्धन की सूनी आँखें,
या धन का झूठा श्रृंगार लिखूं।
रोटी को तरसते होंठ लिखूं,
या वैभव का अहंकार लिखूं।
मैं बिकते हुए समाचार लिखूं,
या सच की निर्भीक पुकार लिखूं।
जो सोई हुई चेतना जगा दे,
ऐसा प्रखर विचार लिखूं।
मैं बदले की धधकती ज्वाला,
या क्षमा का विस्तार लिखूं।
फर्ज निभाते उन वीरों का,
अमर और उज्ज्वल व्यवहार लिखूं।
मैं बेटी की पहली किलकारी,
या उसके स्वर्णिम भाग्य लिखूं।
जिससे घर-आँगन जगमग हो,
उस जीवन का सौभाग्य लिखूं।
मैं भारत की पावन माटी,
या वीरों का बलिदान लिखूं।
तिरंगे की ऊँची गौरव-गाथा,
या जन-जन का अभिमान लिखूं।
मैं मित्रों का अटूट भरोसा,
या छलते दुश्मन का वार लिखूं।
रिश्तों की सच्ची गर्माहट,
या विश्वास का संसार लिखूं।
मैं रामायण की मर्यादा,
महाभारत का धर्म-विचार लिखूं।
राणा का अडिग स्वाभिमान,
या कुंभा का गौरव-गान लिखूं।
मैं ऋषियों का निर्मल चिंतन,
या संतों का उपकार लिखूं।
मानवता की अमर मशाल,
या सेवा का सत्कार लिखूं।
न झूठ का मैं साथ लिखूं,
न स्वार्थों का व्यापार लिखूं।
जन-जन के हित में जीने वाला,
हर शब्द सदा साकार लिखूं।
बस इतना वरदान दो, माँ शारदे,
वाणी में निर्मल सत्य भरूं।
युग बदले, पर धर्म न बदले,
मैं जो भी लिखूं, केवल सत्य लिखूं।
*स्वरचित मौलिक*
*कवि दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’*




