साहित्य

प्यार पिता या तुम से 

डॉ रामशंकर चंचल 

मेरे पास प्यार के सिवा कुछ नहीं है इसलिए नफरत कभी नहीं रही फिर कोई भी हो सभ से प्यार किया है मानव मात्र पशु पक्षी सभी प्रणियों से आज भी करता हूं यह उनका विषय है कि वो मुझे से करते हैं या नहीं या करते हैं तो कितना क्यों आदि सैकड़ों बातें है सोचना नहीं चाहता हूं

यादें तो सुख सुकून देती है आज भी जिंदा रखें पिता के अथाह प्यार की जो एक दोस्त की तरह साथ रहा आजीवन और आज भी सदा उन्हें साथ महसूस करता हूं

वो जानते थे रामू क्या है,खैर पिता की तरह जब तक तुम साथ थी सदा साफ़ मन आत्मा से बिना कोई चाह अपेक्षा के हर पल हर दम मेरा ख्याल रखा मेरी आंखों से गिरा हुआ एक आंसू तुम्हें विचलित कर देता था सोच आज भी हैरान हूं तुम्हें पता कैसे चलता था कि मैं रो रहा हूं

सर, रोना नहीं या चंचल सर आप रो रहे हैं क्या होगी रोने से यह दुनियां ऐसे ही है समझते क्यों नहीं आदि आदि चिन्तित हो धरा प्रवाह बोलने लगती, लोगों को क्यों खुश करते हैं सर , यह दुनियां रोते को देख खुश होती हैं और प्रसन्न को देख जल जाती है समझते क्यों नहीं

रोना बंद करे और खुश और प्रसन्न रह दुनियां को जलाए सर

उसका अथाह प्यार अपनापन देख चौक जाता था जो उम्र के 60, में पहली बार किसी से नसीब हुआ

दुनियां में ऐसे विरले लोग हैं अद्भुत इंसान है एक जैसे पूरी तरह कभी सुना था पर आज ख़ुद जीवन में पहली बार महसूस कर रहा था

और यही पीठ का तुम्हारा प्यार याद कर जी रहा हूं कोई तो है जो प्यार की परिभाषा समझता है वरना दुनियां तो प्यार को आज तक नहीं समझ पाई

रूप और यौवन में पगलाई दुनियां को मेरी बाते बकवास लगती हैं जानता हूं पर यह भी परम सत्य है कुछ ही सही आज भी प्यार को समझते है और सुख सुकून से जीते हैं

 

खैर आज तुम्हारा प्यार याद आ गया पिता जी याद आ गए अच्छा लगा और कलम चल पढ़ी बेबाक लिखता हूं जिंदगी भर डरता रहा

नहीं लिखना सत्य बहुत कड़वा होता है पर सोचता हूं मुझे जीना है तो यह सब लिखना होगा और यह बात तुम अच्छी तरह जानती थी

खैर प्रणाम रूह सत् सत् वंदन तुम्हें और इन देवता रूपी पिता को जो मेरे ईश्वर आशीष से थे और है आज भी उन्हीं में सदा ईश्वर देखा और इसे ज्यादा कही ईश्वर आशीष कृपा का अहसास नहीं हुआ नहीं जानता हूं क्यों पर है ईश्वर देखा है पिता में जो आज भी मेरे पास साथ है

डॉ रामशंकर चंचल

झाबुआ मध्य प्रदेश

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