
प्रेम तर्क से हो परे, आए तभी निखार।
निश्छल मन का भाव ये, ईश्वर का उपहार।
मधुर प्रेम अहसास में, रखिए नित विश्वास,
जीवनदायी ये सदा, सरल हृदय उद्गार।।
(२)
प्रेम अगम अनुपम अमित, इसमें नहीं बखान।
सहज भाव इसमें बसे, रखना इसकी शान।।
जीवन ये अनमोल है, करिए सबसे प्रीत।
बिना प्रेम के जिन्दगी, बन जाता पाषान।।
(३)
प्रेम छिपाए ना छिपे, सुखद सुगम अनुभूत।
उपजे बेटी प्रेम की, बेटा हो मजबूत।
रिश्तों के संसार में, प्रेम सदा ही मूल,
देता ये परिवार को, सुख समृद्धि अकूत।।
(४)
प्रेम कृष्ण की बाँसुरी, राधा का है नाम।
पावन से इस भाव में, बसते चारों धाम।
बहुत अनूठा प्रेम है, मिले जहाँ संयोग,
दीन सुदामा- कृष्ण का, प्रेम रहा निष्काम।।
(५)
प्रेम धरोहर ईश का, रखिए इसे सँभाल।
जिसके उर ये आ बसे, करे जन्म खुशहाल।
सौ रोगों की है दवा, तन-मन रखता स्वस्थ,
देना जग को प्रेम सब, रखकर हृदय विशाल।।
डाॅ०(कु०)शशि जायसवाल, प्रयागराज, उत्तर प्रदेश।
@स्वरचित मौलिक एवं अप्रकाशित कृति
दिनांक – 05/07/2026




