
बीते दिन लौटे नहीं,रह गई बस याद।
बचपन के दिन आज भी, सोच करतीं निहाल।।
जाने कहां गए बचपन के दिन,
जब छत पर तारे गिनते थे।
बिजली गई तो हँस-हँस कर,
भूत-प्रेत की कहानी सुनते थे॥
आम के पेड़ पर झूला था,
पड़ोस की कैरी तोड़ते थे।
माँ की डांट और पापा का प्यार,
उसी में खुशियाँ मोड़ते थे॥
स्लेट-पट्टी, तख्ती, चॉक,
स्कूल की घंटी का इंतज़ार।
टिफिन में अचार वाली रोटी,
दोस्तों से आधा-आधा बाँटते थे॥
शाम ढले तो गिल्ली-डंडा,
कंचे और पकड़म-पकड़ाई।
मोबाइल नहीं था हाथों में,
बातें होती थीं आँखों-आँखों से॥
चिट्ठी आती थी महीनों में,
उसका भी मज़ा अलग था।
त्योहार पर नए कपड़े मिलते,
दिल खुशी से पागल था॥
अब सब कुछ तेज़ हो गया,
समय भी भागने लगा है।
रिश्ते स्क्रीन में कैद हुए,
एहसास खोने लगा है॥
जाने कहां गए वो दिन,
वो सादगी, वो अपनापन।
भले लौट कर न आएं कभी,
यादों में बसे हैं वो बचपन॥
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ममता झा मेधा
डालटेनगंज




