
रंग बदलते इस जगत, तुच्छ सोच के लोग।
जन सेवा कैसे करें,पले कपट का रोग।
चाटुकारिता रग बसी,मन में रहता चोर,
मौका पाते ही सदा, सत्ता का उपयोग।।
मानवता की क्षति करे, स्वार्थी हुआ समाज।
सप्तरश्मियों के रथी, हुए बहुत नाराज।
ज्वाला उर में है भरी,उगल रहें हैं आग,
इसी बहाने कह रहे,मानो सब कुछ आज।।
नैतिक भाव विचार हो, मानवता संदेश।
धार प्रतिज्ञा नित बढ़े, पर के काटो क्लेश।
सेवा करना लक्ष्य हो, शुचि विनम्र व्यवहार,
दीन-दुखी से प्रेम कर, सुखद बने परिवेश।।
शिक्षा स्वास्थ्य विवेक से, हरिए सकल विकार।
विभीषिका सुलझे कुटिल, दूजे भ्रष्टाचार।
दूर करो इसको सभी, नैतिकता हो धर्म,
तब जगता देवत्व है, सुखमय हो संसार।।
बजे श्वाँस की रागनी, शब्दों की झंकार।
गीत रचे ऐसा सदा, जिसमें हो रसधार।
सराबोर सबको करे, हरे सकल अज्ञान,
शीतल सब का हो हृदय, बढ़े प्रेम संचार।।
डॉ गीता पांडेय अपराजिता
सलोन रायबरेली उत्तर प्रदेश




