साहित्य

भींगे नयन

ममता झा मेधा 

बादल बनकर आँखों में बरस जाता है दर्द,

यादों की बूंदों से भीग जाता है हर पल।

होंठों पर मुस्कान का मुखौटा लगा लेते हैं,

पर भींगे नयन सब राज खोल देते हैं।

किसी के जाने का ग़म नहीं सताता इतना,

जितना उसके “ठीक हो?” ना पूछने का मलाल।

चाय की प्याली में भी तस्वीर दिख जाती है,

रात के सन्नाटे में आवाज़ गूँज जाती है।

और काजल के साथ आँसू घुलकर

गालों पर मोती सी लकीर बना जाते हैं।

माँ की ममता में भीगे नयन सबसे पवित्र,

जब गोद में सिर रखकर वो लोरी सुनाती है।

गुरु के चरणों में भीगे नयन सबसे निर्मल,

जब आशीष मिलता है और हौसला बढ़ जाता है।

देश की सरहद पर खड़े जवान के भीगे नयन,

जब माँ की चिट्ठी आती है और वो उसे सीने से लगाता है।

किसान के भीगे नयन जब पहली बारिश में

खेत की मिट्टी से खुशबू उठती है।

भींगे नयन कमजोरी नहीं गुरुवर,

ये तो रूह के स्नान का दूसरा नाम है।

जो धो डालते हैं मन का मैल,

और दिल को फिर से जीना सिखा जाते हैं।

कभी खुशी में भीगते हैं, कभी ग़म में,

पर हर बूंद में एक कहानी पलती है।

क्योंकि भींगे नयन ही तो इंसान होने की पहचान है।

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ममता झा मेधा

डालटेनगंज

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