साहित्य

कुछ इस तरह से खुद को सम्भाला है

संगीता वर्मा,

बहुत संभाला है ज़माने की खातिर,

बस कुछ इस तरह मैंने खुद को संवारा है।

टूटे हुए ख्वाबों को समेट कर,

मैंने खुद ही अपना सहारा है॥

 

दुनिया की भीड़ में खो न जाऊं कहीं,

खुद से ही मैंने एक रिश्ता बनाया है।

अकेले में रोकर आँखें पोंछ लीं,

और फिर आईने के सामने मुस्कुराया है॥

 

वक्त की धूप में जलते रहे हैं कदम,

मगर हौसलों की छांव मैंने खुद बुनी है।

दूसरों की उम्मीदों से आगे निकलकर,

अब मैंने बस अपने दिल की सुनी है॥

 

अब फर्क नहीं पड़ता कौन साथ है,

मैं खुद ही अपनी सबसे बड़ी जीत हूँ।

हर जख्म को मैंने सी लिया है खुद ही,

और खुद ही अपनी जिंदगी की मीत हूँ॥

 

स्वरचित एवं मौलिक

संगीता वर्मा, कानपुर उत्तर प्रदेश

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