
।। खामोश ।।
खामोश,
ये शब्द बढ़ा ही मुश्किल हैं।
पर एहसास बहुत सारे ,
रोना भी भुला देती हैं,
खुश होना भी भुला देती हैं।
साथ में खुदको भी भुला देती हैं।
खामोश हूँ,
पर लाख एहसास है साथ में ,
पर लाख कोशिशे भी है साथ में ।
संभालना , ठहरना , मुस्कुराना , हसना , बोलना , रुठना ,
सब भूल गई हूँ।
बस खामोश हूँ
बस खामोश हूँ।
कुछ कहु तो भी कोई सुनने को नहीं
कुछ सुनु तो भी कोई बोलने को नहीं।
शायद खामोश इसलिए हूँ,
क्योंकि कोई नहीं।।
– रिया राणावत
कालीदेव, झाबुआ(मध्यप्रदेश)



