साहित्य

बरस बरस घन

वीणा गुप्त 

बरस -बरस घन,

रिमझिम- रिमझिम ।

सरस- सरस कर,

धरा का आँगन।

आया सावन।

हर्षित तरू -तृण,

पुलकित हर उर।

 

झूले पड़ गए,

शाख-शाख पर।

छाया नवयौवन,

प्रकृति पर।

पुष्प खिले,

ले सुरभि-गागर।

मलय बयार,

ढुलकाए इसको,

बहे मंथर -मंथर।

 

आए भ्रमर,

गूंजा पिक स्वर।

मयूर उमंगित,

हो नर्तित पर।

फूटे मरकत के,

शत निर्झर।

झर-झर ,झर-झर।

 

किश्ती कागज की ,

नाजुक सी ,चलती है ,

जल की लहरों पर।

ढुलमुल -ढुलमुल ,

अस्थिर -अस्थिर।

अनजान डगर पर।।

 

खोल झरोखा ,

अब अंबर का ,

भीगा -भीगा,

झाँका दिनकर।

किरणें बिखरीं।

इंद्रधनु की ,

बनी रंगोली ।

सुंदर मनहर।

आओ- आओ,

सावन प्रियवर।

वीणा गुप्त

नई दिल्ली

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