साहित्य

झरना

डॉ. दक्षा जोशी

क पहाड़ी झरना है

जिसके गिरते पानी में,

नदियों का स्वर है,

और,पहाडों से बिछड़ने का दर्द भी!

नित्य बहूँ मैं,

नित्य चलूँ,

नित्य मैं बहता रहूँ,

तभी जाके कहीं,

सागर को ख़ोज पाऊँ।

कल्पनाएँ और भाव,

भाषा के मोहताज़ नहीं,

वे भी तो बह ही निकलेंगे

कभी बारिश, कभी झरना,

कभी उफ़नती नदीबनकर !

हाँ, भाषा और शब्द,

ज़रूर अलग-थलग,

टूट जाते हैं; जब सिर्फ़

लिखना ही मंतव्य हो,

पर अभिव्यक्त करने को

कुछ नहीं !!!

 

-डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’

अहमदाबाद, गुजरात।

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