साहित्य

हुर्रे हुर्रे बारिश आयी 

डॉ प्रभा जैन

देख बादलों की उमड़- घुमड़

 

मुस्कुराया सूरज, होरहा मैं कितना गर्म,

 

चलूँ मैं भी नहा लेता हूँ, ताप थोड़ा ठंडा कर लेता हूँ।

 

भागे आये मिट्ठू-मिष्टी, देख बादलों की अठ- खेलिया

झूम-झूम स्कूल कविता गाने लगे।

 

मिट्ठू बना लाया नाव, मिष्टी पानी में तैरा रही,

देखो देखो ऊपर आकाश

इंद्रधनुष निकल आया।

 

रिमझिम रिमझिम बरसा पानी

 

मस्त-मस्त इस आलम में

उछल उछल बच्चे नहा रहे,

दूर से मम्मी दे रही आवाज

आ जाओ लल्ला बस इतना ही भीगो।

 

दादुर मोर पपीहा टेर लगा है

सब गड्डे पोखर भर गये

झूला पढ़ गया बाग में,

सोंधी-सोंधी मिट्टी खुशबू

आँगना महका रही।

 

पेड पौधे धरा पुष्प पुष्प सब

खिल गये बाग बगीचे, खुश हो नृत्य कर रहे।

झूम रही डाल-डाल।

 

मिट्ठू बोला हुर्रे

मिष्टी बोली हुर्रे

 

डॉ प्रभा जैन “श्री”

देहरादून

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