देख बादलों की उमड़- घुमड़
मुस्कुराया सूरज, होरहा मैं कितना गर्म,
चलूँ मैं भी नहा लेता हूँ, ताप थोड़ा ठंडा कर लेता हूँ।
भागे आये मिट्ठू-मिष्टी, देख बादलों की अठ- खेलिया
झूम-झूम स्कूल कविता गाने लगे।
मिट्ठू बना लाया नाव, मिष्टी पानी में तैरा रही,
देखो देखो ऊपर आकाश
इंद्रधनुष निकल आया।
रिमझिम रिमझिम बरसा पानी
मस्त-मस्त इस आलम में
उछल उछल बच्चे नहा रहे,
दूर से मम्मी दे रही आवाज
आ जाओ लल्ला बस इतना ही भीगो।
दादुर मोर पपीहा टेर लगा है
सब गड्डे पोखर भर गये
झूला पढ़ गया बाग में,
सोंधी-सोंधी मिट्टी खुशबू
आँगना महका रही।
पेड पौधे धरा पुष्प पुष्प सब
खिल गये बाग बगीचे, खुश हो नृत्य कर रहे।
झूम रही डाल-डाल।
मिट्ठू बोला हुर्रे
मिष्टी बोली हुर्रे
डॉ प्रभा जैन “श्री”
देहरादून




