साहित्य

बरसो बादल

शशि कांत श्रीवास्तव

बरसो बादल…बरसो बादल !

धरती का तुम श्रृंगार करो,

सूखी नदियाँ,सूखे मन में,

जीवन का संचार करो |

बरसो बादल…बरसो बादल !

देखो खेत खड़े हैं कब से,

आँख बिछाए राहों में |

प्यासे पत्ते, मौन दिशाएँ,

आह भरी है चाहों में |

बूँद-बूँद अमृत बरसाकर,

हर जन का उद्धार करो तुम |

बरसो बादल…बरसो बादल !

धरती का श्रृंगार करो |

जब-जब तुम घनघोर गरजते,

साहस भी मुस्काता है |

मोर नाचता, वन गाता है,

हर कण गीत सुनाता है |

भेद मिटाओ ऊँच-नीच के,

प्रेम-सुधा की धार भरो |

बरसो बादल…बरसो बादल !

धरती का तुम श्रृंगार करो,

सूखी नदियों, सूखे मन में,

जीवन का संचार करो ||

 

*शशि कांत श्रीवास्तव*

डेराबस्सी मोहाली, पंजाब

स्वरचित मौलिक रचना

03-07-2026

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