
बरसो बादल…बरसो बादल !
धरती का तुम श्रृंगार करो,
सूखी नदियाँ,सूखे मन में,
जीवन का संचार करो |
बरसो बादल…बरसो बादल !
देखो खेत खड़े हैं कब से,
आँख बिछाए राहों में |
प्यासे पत्ते, मौन दिशाएँ,
आह भरी है चाहों में |
बूँद-बूँद अमृत बरसाकर,
हर जन का उद्धार करो तुम |
बरसो बादल…बरसो बादल !
धरती का श्रृंगार करो |
जब-जब तुम घनघोर गरजते,
साहस भी मुस्काता है |
मोर नाचता, वन गाता है,
हर कण गीत सुनाता है |
भेद मिटाओ ऊँच-नीच के,
प्रेम-सुधा की धार भरो |
बरसो बादल…बरसो बादल !
धरती का तुम श्रृंगार करो,
सूखी नदियों, सूखे मन में,
जीवन का संचार करो ||
*शशि कांत श्रीवास्तव*
डेराबस्सी मोहाली, पंजाब
स्वरचित मौलिक रचना
03-07-2026




