साहित्य

आश्रित

राजीव त्रिपाठी

ज़िन्दगी जितनी दूसरों पर आश्रित होगी

स्वाभिमान से ज़िन्दगी उतनी ही दूर होगी!!

दिल को रोकेंगे कैसे भला हम हादसों से

ख़ुशियांँ हर क़दम पर सूबुक रही होगी!!

नहीं होगा गुज़ारा किसी के बग़ैर

शाम को रात की ज़रूरत होगी!!

फ़ैसला किसके हक़ में आएगा

रात जब इतनी बड़ी होगी!!

हम सा बेबस दुनिया में कोई नहीं

हर एक ज़िन्दगी छल रही होगी!!

एतिबार उनसे ज़्यादा किस पर करें

कहानी अपनी-अपनी सब ने कहीं होगी!!

बुरा वक़्त क्या आया मेरी ज़िन्दगी में

रोज़ लोगों की मुझसे ठनी होगी!!

वक़्त बदलते ही सब बदलते हैं इन्सान

आपके बदलने की क्या वज़्ह रही होगी!!

एक मुद्दत से मैं जगा हुआ हूंँ

हर एक आहट से मेरी नींद यूंँ खुली होगी!!

हो गई है हमारी उम्र ज़्यादा

या लोगों को ही ज़्यादा लग रही होगी..!!

 

स्वरचित- राजीव त्रिपाठी

उदयपुर राजस्थान

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