
देव शयनी एकादशी पर्व ,सनातन धर्म की दिव्य सौगात।
माह आषाढ़ तिथि शुक्ल पक्ष ग्यारस को होता पर्व ,लाता पुण्य सौगात।
प्रभु हरि विष्णु जाते योगे निद्रा शयन को, पैदा होते विष्णु भक्ति के जज्बात।
ग्रंथ पद्म पुराण, श्री भागवत गीता, स्कंद पुराण, भविष्य पुराण में, देवशयनी एकादशी का मिलता महत्व पुण्य प्रताप ।
श्री हरि का षोडशोपचार पूजन, तुलसी दल, पीले वस्त्र, पीले फूल, पीली मिठाई ,पंचामृत अर्पण कर ,पाए पुण्य प्रताप ।
“ओम नमः भगवते वासुदेवाय “मंत्र का करें जाप ,मिटे संताप ।
विष्णु सहस्त्रनाम ,श्रीमद् भागवत गीता पाठ से ,मिले पुण्य प्रताप।
देव शयनी ग्यारस का संदेश -जब प्रभु हो योग निद्रा में, तब भक्त करें आध्यात्मिक चेतना जागृति की शुरुआत।
पंचतत्व से बना शरीर भी पुष्प -सा खिल जाएगा जैसे हो फूल पारिजात।
देव शयनी ग्यारस पर्व से चार माह तक नहीं होते शादी ,ग्रह प्रवेश, मुंडन शुभ काज, देव उठी ग्यारस से फिर होती शुरुआत।
चातुर्मास में पूजा पाठ, ध्यान ,धर्म विधान से होती, पुण्य फल की बरसात ।
सावन माह में शिव, सोमवार व्रत पूजन अभिषेक ,कावड़ यात्रा की मिलती सौगात।
माह भादव में गणेश चतुर्थी, जन्माष्टमी पर्व करते ,भक्ति आनंद की बरसात।
सृष्टि के सुंदर जनजीवन में, नहीं करना कोई खुरापात, देवशयनी पर्व देता है पुण्य प्रताप।
रचयिता
डॉक्टर शशिकला अवस्थी इंदौर मध्य प्रदेश



