
घर का सबसे बड़ा बेटा,
उम्र से पहले बड़ा हो जाता है।
जब पिता की आँखों में चिंता उतरती है,
वह अपने बचपन का बस्ता
चुपचाप एक कोने में रख देता है।
उसके हिस्से की धूप
छोटे भाई-बहनों के आँगन में चली जाती है,
और वह स्वयं
जिम्मेदारियों की छाँव में
दिन-रात खड़ा रह जाता है।
उसके भी सपने होते हैं,
मगर वे अक्सर
घर की ज़रूरतों के आगे
बिना शोर किए दम तोड़ देते हैं।
वह रोता भी है,
पर तकिए से पूछकर।
मुस्कुराता भी है,
पर माँ की आँखों में
उम्मीद बचाए रखने के लिए।
बहनों की विदाई में
सबने आँसू देखे,
किसी ने नहीं देखा-
उन डोलियों के साथ
उसका बचपन भी विदा हो गया था।
घर की हर ईंट में
उसकी अधूरी इच्छाएँ चुन दी गईं,
और लोग कहते रहे,
“देखो, बड़ा बेटा कितना मजबूत है।”
किसी ने यह नहीं पूछा,
मजबूत बनने की कीमत
उसने आखिर चुकाई कितनी थी…
*क्या बड़े बेटे की कहानी यहीं समाप्त हो जाती है?*
*नहीं… अभी उसके त्याग की सबसे बड़ी परीक्षा शेष है*
*कवि दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’*
*जनपद संभल उत्तर प्रदेश*
*सम्पर्क 8279709465*




