साहित्य

तास के पत्ते

चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा

हैं तास के बावन पत्ते,ये सबके सब हरजाई,

कोई हारे या फिर जीते,सब बोलें राम दुहाई।

पातशाह है इक्का पहले, फिर बादशाह है आता,

खल्क खु़दा का, मुल्क शाह का,है ये याद दिलाता।

बेगम भी जब बने पतुरिया, हर हाथों में जाये,

नौकरशाही सा रंग जमाता, है गुलाम इतराये।

दहला दे जो रण में सबको,वह दहला कहलाये,

कभी बजाता नौबत नहला, या नौबत करवायें।

अट्टहास करवाये अट्ठा,या जग में हेठी करवायें,

मौका पाकर सत्ता भी, शतरंगी चाल दिखलाये।

रहे चतुर यदि पत्तेबाजी में छक्का,छक्का छुडा़ये,

या फिर प्रतिद्वंदी से मिलकर,पंजा हाथ मिलाये।

तिकडी़ चौकपुरावे चौक्का से,तिकड़म जो लगजाये,

है दुग्गी धौंस जमावे आखों से, इक्का को फिकवाये।

अज़ब खेल है पत्तेबाजी,शकुनी को लाज लजावे,

जोकर जो मिल जाये तो ये, फौरन वीटो लगवाये।

✍️चन्द्रगुप्त प्रसाद वर्मा “अकिंचन ”

चलभाष ९३०५९८८२५२

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