
हर अंधकार चीर के जो दीप बन गए,
मस्तक झुका के आज वो भगवान मिल गए।
दीमक लगी हुई थी जो इस रूह-ए-शख़्स पर,
छू कर के हाथ पावन वो वरदान मिल गए।
थी नाव डगमगाती भंवर में विचारों के,
पटवार हाथ थाम के पतवार मिल गए।
दुनिया की इस भीड़ में भटकी हुई सी थी,
ख़ुद से मिली, मुझे वो जो पहचान मिल गए।
नतमस्तक शीश है गुरू चरणों की धूल पर,
मुझको मेरे सुराख-ए-अरमान मिल गए।
-डॉ. दक्षा जोशी’निर्झरा’
अहमदाबाद गुजरात।



