
क्रोध मनुष्य की स्वाभाविक भावना है। अन्याय, अपमान, निराशा या असंतोष की स्थिति में कभी-कभार गुस्सा आना सामान्य बात है। लेकिन यदि छोटी-छोटी बातों पर बार-बार क्रोध आने लगे, बात-बात पर चिल्लाना, गाली-गलौज करना, हाथापाई करना या लंबे समय तक मन में क्रोध बनाए रखना आदत बन जाए, तो यह केवल स्वभाव नहीं बल्कि स्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरे का संकेत है। लगातार क्रोध करने वाला व्यक्ति धीरे-धीरे अनेक शारीरिक, मानसिक और सामाजिक बीमारियों की गिरफ्त में आ सकता है। इसलिए समय रहते इस पर नियंत्रण आवश्यक है।
क्रोध का शरीर पर प्रभाव :- जब हमें गुस्सा आता है, तब शरीर में एड्रेनालिन और कॉर्टिसोल जैसे तनाव हार्मोन तेजी से बढ़ जाते हैं। इससे हृदय की धड़कन तेज होती है, रक्तचाप बढ़ जाता है और शरीर “आपातकालीन स्थिति” में पहुंच जाता है। यदि यह स्थिति बार-बार बने तो शरीर के लगभग सभी अंग प्रभावित होने लगते हैं।
अधिक क्रोध करने से होने वाली संभावित बीमारियाँ :- लगातार गुस्सा करने वाले लोगों में निम्न समस्याओं का खतरा बढ़ जाता हैं:- उच्च रक्तचाप ,हृदय रोग एवं हार्ट अटैक,ब्रेन स्ट्रोक,मधुमेह (डायबिटीज),मोटापा एवं मेटाबॉलिक सिंड्रोम, अनिद्रा (नींद की कमी),अवसाद (डिप्रेशन),चिंता एवं मानसिक तनाव,माइग्रेन और बार-बार सिरदर्द,गैस, एसिडिटी, अपच एवं पेप्टिक अल्सर,इरिटेबल बॉवेल सिंड्रोम (IBS),प्रतिरोधक क्षमता (इम्यूनिटी) में कमी,बार-बार संक्रमण होना,त्वचा रोग जैसे सोरायसिस और एक्जिमा का बढ़ना,गर्दन, कंधे और कमर में दर्द,मांसपेशियों में जकड़न,यौन इच्छा में कमी एवं वैवाहिक तनाव,याददाश्त और निर्णय क्षमता में कमी।
केवल शरीर ही नहीं, रिश्ते भी बीमार हो जाते हैं:- गुस्सैल व्यक्ति दूसरे का नुकसान करे या न करे, सबसे पहले अपना नुकसान करता है। उसका परिवार उससे डरने लगता है, बच्चे खुलकर अपनी बात नहीं कह पाते, पति-पत्नी के संबंध कमजोर होने लगते हैं, मित्र दूर होने लगते हैं और कार्यस्थल पर सम्मान कम होने लगता है।
ऐसे लोगों का आत्मविश्वास भी धीरे-धीरे कम होता जाता है और वे अकेलेपन, तनाव तथा मानसिक पीड़ा का शिकार हो सकते हैं।
बार-बार गुस्सा क्यों आता है? :-
इसके अनेक कारण हो सकते हैं:-आनुवंशिक (जेनेटिक) प्रवृत्ति,बचपन का वातावरण,परिवार में तनावपूर्ण माहौल,अत्यधिक अहंकार या जिद,असफलता स्वीकार न कर पाना,नींद की कमी, लगातार मानसिक तनाव,आर्थिक या पारिवारिक समस्याएँ,शराब, नशा अथवा अन्य गलत आदतें, कुछ मानसिक एवं स्नायविक विकार।
गुस्सा आने के शुरुआती संकेत :- यदि समय रहते संकेत पहचान लिए जाएँ तो गुस्से को बढ़ने से रोका जा सकता है :- हृदय की धड़कन तेज होना,सांस तेज चलना,चेहरा लाल पड़ना,जबड़े या मुट्ठियाँ भींचना,सिरदर्द होना,शरीर में कंपन महसूस होना, कंधों में जकड़न,बेचैनी और चिड़चिड़ापन।
गुस्से पर नियंत्रण कैसे करें? :- गहरी एवं धीमी साँस लें,दस तक गिनें और तुरंत प्रतिक्रिया न दें , एक गिलास पानी पी लें,कुछ देर टहलें,योग, प्राणायाम और ध्यान को जीवन का हिस्सा बनाएं,पर्याप्त नींद लें,नियमित व्यायाम करें,संतुलित एवं पौष्टिक भोजन लें,जंक फूड,फास्ट फूड अथवा स्ट्रीट फूड यथासंभव कम ग्रहण करें,अपनी पसंद का संगीत सुनें, किसी विश्वसनीय व्यक्ति से अपनी बात साझा करें,क्षमा करना सीखें ,वर्तमान समस्या पर बात करें, पुरानी बातें न दोहराएँ,हर बात अपने अनुसार होने की अपेक्षा छोड़ें,सकारात्मक सोच विकसित करें,अपने शौक के लिए समय निकालें।
कब चिकित्सकीय सलाह लेना आवश्यक है? :- यदि गुस्से के कारण परिवार टूटने की स्थिति बन रही हों,बार-बार हाथापाई या गाली-गलौज हो रही हों,ऑफिस या व्यापार प्रभावित हो रहा हों,नींद, तनाव या अवसाद लगातार बना हुआ हों,रक्तचाप या हृदय संबंधी समस्याएँ बढ़ रही हों, तो बिना देर किए योग्य चिकित्सक से सलाह लें। आवश्यकता पड़ने पर जीवनशैली में सुधार तथा योग्य होम्योपैथिक चिकित्सक द्वारा रोगी के सम्पूर्ण मानसिक एवं शारीरिक लक्षणों के आधार पर उचित उपचार भी लाभदायक हो सकता है। याद रखिए, क्रोध समस्या का समाधान नहीं, बल्कि अनेक नई समस्याओं की शुरुआत है।जो व्यक्ति अपने क्रोध पर विजय प्राप्त कर लेता है, वही अपने स्वास्थ्य, परिवार, समाज और जीवन को सुखमय बना सकता है। शांत मन, मधुर वाणी, संयमित व्यवहार और सकारात्मक सोच ही स्वस्थ एवं सफल जीवन की वास्तविक पहचान हैं।




