
भाग–4 : बंद चौखट का इंतज़ार*(बीमार पिता, माँ की विवशता और बेटी की मौन पीड़ा)
आँगन अब भी वैसा ही है,
बस चिड़िया की तान नहीं।
द्वारे बैठा बूढ़ा बाबुल,
कहता कुछ, पर जान नहीं।
बरगद जैसा वह पिता अब,
धीरे-धीरे झुकता है।
बेटी की इक आहट सुनने,
हर पल राह तकता है।
माँ मंदिर में दीप जलाकर,
बस यही अरदास करे।
“हे प्रभु! मेरी बिटिया को,
एक दिन बाबुल घर आने दे।”
भैया कितनी बार गया था,
बहना को घर लाने को।
लौटा लेकिन भीगी पलकों,
मन का दर्द छिपाने को।
बेटी भी क्या कम रोती है,
मन को रोज़ समझाती है।
तकिए में मुँह छिपा-छिपाकर,
चुपके आँसू बहाती है।
हर सुबह निगाहें उठतीं,
साँझ ने उम्मीद जगाई।
हर दस्तक पर लगता जैसे—
“शायद मेरी बिटिया आई…”
पिता नहीं कुछ माँग रहे,
न धन, न कोई उपहार।
एक झलक बस देख लूँ,
मिल जाए मन को करार।
सूनी चौखट रोज़ खड़ी है,
राह उसी की तकती है।
ढलती धूप के संग-संग,
आशा फिर भी जगती है।
सुनो जगत! यह याद रहे,
रिश्ते केवल रीत नहीं।
माँ-बाबुल की आँखों में,
बेटी से बढ़कर प्रीत नहीं।
‘दिव्य’ की बस एक पुकार-
बेटी जब भी घर आ जाए,
उसको गले लगाना तुम।
माँ-बाबुल की साँसों का,
कुछ तो मान बचाना तुम।
*दिनेश पाल सिंह ‘दिव्य’*
*जनपद संभल उत्तर प्रदेश*




