
इश्क़ एक अलग सा एहसास हैं
इस शब्द की एक अलग ही बात हैं
कभी सोचों
अगर इश्क़ न होता
तब शायद हमें कोई एहसास होता
इश्क़ ही एहसास है ओर एहसास ही सुकून
इश्क़ ही एहसास है ओर एहसास ही सुकून
इश्क़ ने सिखाया एहसास सबको,
जब मुझे हुआ
तब मुझे समझ आया
की एहसास ही सुकून हैं।
इश्क़ एक बार होता
ये बिल्कुल गलत हैं
इश्क़ एक शक्श से होता है
ये भी बिल्कुल गलत हैं
इश्क़ तो वो सुकून हैं
जो एक रूह से होता हैं
ओर वो रूह
हर पल अलग अलग रूप में आती हैं
बस समझना होता हैं
इश्क़ के सुकून को
बस परखना होता है
इश्क़ को यारो
तो सुकून मिल जाता है
इश्क़ से सुकून
सिर्फ सुनने में खाश है
इश्क़ देता है दर्द
यही असल बात है
जब कभी हो इश्क़ किसी से
टोह एक बात समझ आजाएगी
के गुल फ़लक में
खिल रहा हैं
के गुल फ़लक में
खिल रहा है
भागों में खिलता नहीं
दिल को जिससे प्यार होता हैं
वहीं मिलता नहीं
वहीं मिलता नहीं
मोहोब्बत में
नाराज़गी आएगी
जो आशिक़ को तड़पाएगी
समझ जा मेरे आशिक़
ये तेरी मोहब्बत तुझे किया किया रंग दिखायेगी
उस सुकून को
उस तलप को
उस इश्क़ को
उस जुनून को
उस बेदर्दी को
उस ख्वाइश को
उस तमन्ना को
उस जख्म को
उस उम्मीद को
जो करा रही हैं मोहब्बत का नया सुकून तुमसे ।।
– रिया राणावत
कालीदेवी,झाबुआ(मध्यप्रदेश)




