
जहरीली सांसों से भरा पर्यावरण फैला हर ओर है
नीला नहीं ये मट मैला आकाश कालिख में लिपटा है
मशीनों की अंधी दौड़ में हमने पाया तो बहुत है
पर जो खो रहे है उसका क्या समाधान है
हर घर के उपर काले धुएँ का डरावना साया है
चिमनियाँ उगल रही हैं जहर सड़कों पर है शोर बड़ा
प्रकृति को कैसे बचाएं ये मेरा सवाल है बड़ा
वो पंछी जो गाते थे अब कहीं दिख क्यों नहीं रहे हैं?
मत भूलो कि ये धरती हमारी भी है उन परिंदों की भी
पेड़ों को कटने से बचाओ हरियाली को बुनना होगा
विकास के इस शोर में प्रकृति को भी सुनना होगा
साफ हवा का हक है आने वाली पीढ़ियों का
आओ मिलकर शपथ लें इस कालिख को हम मिटाएँगे
काले धुएँ को रोककर धरा को फिर से स्वर्ग बनाएँगे
कवि : नीरज तँवर
सांपला, रोहतक (हरियाणा)




