
प्रभु है सृष्टि के ,जीवन दाता।
मानव को सब कुछ देते, प्रभु आनंद दाता।
जनजीवन ,वन ,उपवन के भाग्य विधाता ।
मानव भी बने ,शक्ति सामर्थ के अनुसार दाता।
भूखे को भोजन, प्यासे को पानी दाता।
वस्त्र दे जरूरतमंदों को, बने वस्त्र प्रदाता ।
दीन दुखियों की मदद करें ,धन देकर, बने धन दानदाता।
रोगियों को फल ,आवश्यक औषधि देकर बने खुशी दाता।
अपने- पराए को मृदुल वचन बोलकर ,बने सुखदाता ।
रक्तदान कर बने, रक्तदाता ,मृत देह दान से बने अंगदाता ।
वृक्षारोपण करें ,वृक्षों का रख रखाव करे, बने पर्यावरण संरक्षक शुभदाता।
अन्याय, अत्याचार ,शोषण मिटाए बने सुधारक, न्यायदाता ।
नारी- मातृशक्ति को सम्मान दें, शोषण कर्ताओं के बने दंड दाता। ज्ञान ,विज्ञान ,कला ,अनुसंधान के विकास- प्रसार में बने सहायक दाता।
मातृभूमि की रक्षा में, त्याग ,समर्पण से बने बलिदान दाता।
खुद के स्वास्थ्य के प्रति ,विकास में सजग रहे, बने आत्म सुखदाता।
प्रत्येक दान करें निस्वार्थ होकर, रहे निराभिमानी ,तब ही खुश होंगे प्रभु और भारत माता ।
रचयिता
डॉ शशिकला अवस्थी इंदौर मध्य प्रदेश
रचना स्वरचित और मौलिक है।




