
1.)जैसे धर्माचार्य, वैसे ही अनुयायी। जैसे नेता,वैसी जनता। जैसे योगाचार्य, वैसे ही साधक।जिस ढंग से और जिनके द्वारा सनातनियों को उपदेश पिलाये जा रहे हैं,उनका आचरण??? ऐसे उपदेशकों के उपदेश का जैसा प्रभाव पड़ना चाहिये था,वह भलि तरह से पड़ रहा है।जब हमारे अधिकांश नेता, धर्माचार्य, योगाचार्य, शंकराचार्य, सुधारक,शिक्षक ही भीतर से कुछ और बाहर से कुछ होंगे तो जनता में थोड़ी बहुत सोच समझ की शक्ति बची है।वह देख रही है कि कैसे उपरोक्त तथाकथित लूटेरे,शोषक, अय्याश बड़े लोगों ने लूटपाट, पाखंड और शोषण की आंधी लाई हुई है। सनातनियों को छोड़कर बाकियों के नेताओं, धर्मगुरुओं, सुधारकों में हजार बुराईयां और पाखंड होंगे, लेकिन वो सनातनी नेताओं,धर्मगुरुओं, शंकराचार्यों, सुधारकों की तरह करनी और कथनी में जमीन आसमान का भेद लिये हुये नहीं रहते हैं।इस तरह से सनातनियों में कोई सुधार,एकता और आचरण में सुधार- परिष्कार बिल्कुल भी नहीं होगा। आर्य वैदिक कहलवाने लोग स्वयं ही पाखंड, ढोंग, भेदभाव, पाश्चात्य शिक्षा और जीवन-शैली तथा भोग -विलास में रत हैं। सनातनी या आर्य वैदिक या पौराणिक कहलवाने वाले धर्माचार्य, नेता और सुधारक स्वयं ही एक दूसरे से लड़ रहे हैं।कल जिनके पास साइकिल थी वो आज महंगी विदेशी गाड़ियों में घूम रहे हैं।उनकी संतान कान्वेंट स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम से पढ रही हैं। हिंदी और संस्कृत सिर्फ उनके लिये परस्पर दूसरों को उपदेश पिलाने के लिये हैं। आर्य वैदिक सनातनी पौराणिक शिक्षा,भाषा, भूषा, भूषण, गणवेश, आचरण,आवास, परिवहन, विवाह आदि में कितना करनी और कथनी में बिना भेदभाव के जीवन जीते हैं? शायद उंगलियों पर गिनने योग्य ऐसे व्यक्ति बचे हुये हैं। लेकिन उन बचे हुओं की सुनता कौन है?उनको तो पिछड़ा,जाहिल, अनपढ़, पुरातनपंथी और जमाने की दौड़ में हारा हुआ कहकर दुत्कार दिया जाता है।ऐसी विषम अवस्था,व्यवस्था और दोगले आचरण के रहते सनातनी जनमानस में कोई सुधार नहीं होने वाला है। हां, सुधारकों की मौज,पूजा और सम्मान, प्रतिष्ठा आदि होते रहेंगे।99 प्रतिशत से भी अधिक शारीरिक, मानसिक, वैचारिक,भावनात्मक बिमारियां उन तथाकथित बड़े लोगों में मौजूद हैं,जिन पर सनातनियों के आचरण और व्यवहार में सुधार -परिष्कार की जिम्मेदारी है। हमारे शास्त्रों ने कहा ही है कि जिस रास्ते पर बड़े लोग चलते हैं, उसी रास्ते पर जनमानस चलता है। सनातनियों में जितने अधिक धर्माचार्य, शंकराचार्य, महामंडलेश्वर,सुधारक, योगाचार्य आदि बढ़े हैं,उतना ही सनातनियों के आचरण में बिगाड़ आता गया है।
2.)कबीर जैसे महापुरुषों के चहुंओर शोषक,ठग, स्वार्थी, व्यापारी और धूर्त किस्म के लोगों की भीड़ एकत्र हो गयी है।यह भीड़ कबीर से जनमानस को अवगत नहीं होने दे रही है।यह भीड़ खुद को कहती तो है कबीर का अनुयायी या भक्त या प्रचारक लेकिन वास्तव में यह भीड़ कबीर के चारों तरफ दीवार बनाकर खड़ी हुई है। सीधे -सीधे कबीर को जानने ही नहीं दे रही है।यह भीड़ कहती है कि मेरे माध्यम से कबीर को जानो। कबीरा खड़ा बाज़ार में लिये लुकाठी हाथ,जो घर बारे आपने चले हमारे साथ।ऐसा परिवेश कहीं बनने नहीं दिया जा रहा है।जिन पाखंडों और पाखंडियों का कबीर ने विरोध किया था,यह भीड़ उसी को खाद पानी देने का काम कर रही है। जिम्मेदार जनमानस नहीं अपितु कबीर के वारिस हैं।
3.) लोगों को उनकी बातों से समझो,दिल से नहीं। यदि लोगों को दिल से समझने की कोशिश करोगे तो कदम कदम पर धोखा खाओगे। लोगों के संस्कार अनैतिकता से लबालब भरे हुये हैं। इससे लोगों की सोच स्वार्थी होगी ही।इसे कोई टाल नहीं सकता है। ऐसे धूर्त और ठग प्रवृत्ति के लोगों से दिल से या भावनाओं से बात करोगे तो आपको पछताना पड़ेगा। जैसे को तैसे वाला व्यवहार आवश्यक है। किसी भी परिस्थिति में लोगों से प्रेमपूर्ण व्यवहार की सीख अपराध और अपराधियों तथा धोखेबाज और धोखाधड़ी को बढ़ावा देती है। यदि कुछ दिन जीवित रहना चाहते हो तो दिल के साथ बुद्धि और भावना के साथ तर्क से काम लीजिये।
4.)बिहार के अधिकांश बड़े -बड़े श्मशानघाट एक रुपए की लीज पर बेच दिये गये हैं। बतलाया जा रहा है कि पटना के कोई पंद्रह एकड़ के शमशान घाट को जनता के 90 करोड़ रुपए खर्च करके तैयार किया गया और एक रुपए की लीज पर 33 वर्षों के लिये दक्षिण भारत के एक पाखंडी सद्गुरु को बेच दिया है।जिस दाह-संस्कार के लिये 200-300 रुपये शुल्क होता था,अब वह 3500-5000 तक होगा। और यह सारा रुपया उन दक्षिण के सद्गुरु के संस्थान में जायेगा। हवाई अड्डे बेचे,बस स्टैंड बेचे, रेलवे बेचा, बिजली घर बेचे,होटल बेचे, विश्वविद्यालय बेचे और अब श्मशानघाट भी बेचना शुरू कर दिया है। गर्भाधान संस्कार से लेकर दाह संस्कार तक सभी कुछ बेचा जा रहा है। और इससे खरीदने वालों को जो लाभ होता है, उसमें जनमानस को कोई लाभ नहीं मिलता है। रुपया जनता का और लाभ इन लूटेरे गुरुओं और नेताओं को मिल रहा है।हर स्तर पर लूट-खसोट चल रही है।
5.) यस्तर्केणानुसंधते से धर्म वेद नेत्र:।। (मनुस्मृति,4/86)
मनु ने धर्म का संबंध तर्क और अनुसंधान से बतलाया है। आजकल के बाबा, सद्गुरु,संत, स्वामी, संन्यासी, मुनि,योगी, कथाकार, महामंडलेश्वर आदि पता नहीं क्या क्या उटपटांग हरकतें करके उन्हें धर्म सिद्ध करने पर लगे हुये हैं। पाषाण मूर्ति,पोथी, छायाचित्र,प्रसाद, पोशाक आदि आदि की पूजा करने से सनातन धर्म और संस्कृति की रक्षा नहीं होगी। अयोध्या श्रीराम मंदिर में देख लिया कि श्रीराम मंदिर की आड़ में क्या -क्या घोटाले और पाखंड किये जा रहे हैं। जनमानस आस्था के कारण चढ़ावा चढाता है और आयोजक किस तरह से अपनी अय्याशी के लिये इस चढावे का दुरपयोग कर रहे हैं – सबके सामने है। कोई लाख दो लाख की बात नहीं है अपितु हजारों करोड़ रुपये का घपला हुआ है। यदि थोडा भी तर्क,कारणकार्य और प्रमाणों से काम लिया जाये तो पूरे भारत में लाखों करोड़ रुपये प्रतिवर्ष चढावा,दान आदि के रूप में आते हैं।इसका प्रयोग आधुनिक गुरुकुल,आश्रम, विश्वविद्यालय,प्रयोगशाला, योगशास्त्र,गऊशाला,हवनशाला आदि खोलकर सनातन धर्म और संस्कृति के प्रचार-प्रसार के लिये खर्च किया जाना चाहिये। लेकिन लाखों करोड़ रुपये का इस्तेमाल या तो धर्माचार्यों की अय्याशी के लिये हो रहा है या फिर सत्तासीन नेताओं द्वारा विधायकों और सांसदों की खरीद फरोख्त करने के लिये इस्तेमाल किया जा रहा है। धर्माचार्यों और नेताओं के जीवन से त्याग, तपस्या, संयम और ज्ञानार्जन समाप्त हो गये हैं।वेद,उपनिषद्, दर्शनशास्त्र, व्याकरण आदि का स्वाध्याय करने की बजाय पुराणों की बे-सिर-पैर की कथा कहानियां सुनाने और लड़कियों को नचाने को ही सनातन धर्म और संस्कृति का प्रचार-प्रसार मान लिया गया है।अनेक ढोगी स्वयंभू भगवान्,बाबा, सद्गुरु आदि प्रसाद,शक्तिपात, मूर्तिपूजा, नामदान, दीक्षा आदि देने के बहाने जनमानस को सनातन धर्म और संस्कृति से दूर करके उन्हें विधर्मी बनाने पर तुले हुये हैं।इन पाखंडियों को मनु, वशिष्ठ, अष्टावक्र, पाराशर,व्यास, पाणिनि, पतंजलि,कणाद,गौतम,बादरायण, कपिल, शंकराचार्य, रामानुजाचार्य, स्वामी दयानंद की अपेक्षा जरथुष्ट्र,मूसा,ईसा आदि के प्रति अंधभक्ति में धर्म का सार दिखाई देता है।
6.)स्वामी दयानंद सरस्वती ने मनुस्मृति के अनुसार पाखंडियों के लक्षण बतलाते हुये कहा कि वो धर्मध्वजी, लोभयुक्त, कपटी, संसारियों के सामने स्वयं के प्रशंसक,हिंसक, अच्छे और बुरों से मेल रखने वाले,अधोदृष्टि रखने वाले, छोटे से अहसान के बदले प्राण तक लेने वाले,प्रयोजन साधने में तत्पर, अपनी झूठी बात को भी सही मानने वाले,मिथ्या विनीत – उपरोक्त के संबंध में कहा गया कि न तो इन पर कभी विश्वास करें तथा ही इनकी सेवा करें। लगता है कि जैसे स्वामी दयानंद सरस्वती आजकल श्रीराम मंदिर के चंदा चोरों का विवरण दे रहे हों।इन धूर्तों में ये सारे लक्षण विद्यमान हैं। क्योंकि ये सत्ता के सहयोगी हैं, अतः इनका कुछ भी नहीं बिगड़ेगा।पांच सात छोटे-छोटे लोगों को फंसाकर मामले को रफा-दफा कर दिया जायेगा। बड़ी मछलियां जिनकी दिल्ली तक पहुंच है,उनका कुछ नहीं बिगड़नेवाला।
7.)पचहत्तर वर्षों में हमारे नेता शिक्षा,शोध, स्वास्थ्य, चिकित्सा, परिवहन,पेयजल, सिंचाई,आवास जैसी मूलभूत आवश्यकताओं तक को पूरा नहीं कर पाये हैं।हर तरह की और हर प्रकार के राजनीतिक दलों की सत्ता रह चुकी है लेकिन भारत की आधी से अधिक आबादी अब भी उपरोक्त सुविधाओं से दूर है। कहने को तो लोकतांत्रिक व्यवस्था है लेकिन यह लोकतंत्र राजतंत्र और तानाशाही से भी अधिक शोषक,लूटेरा और भ्रष्ट सिद्ध हुआ है।बात यदि शिक्षा की करें तो पहली कक्षा से लेकर स्नातकोत्तर, पीएचडी आदि तक अव्यवस्था, लूट-खसोट और भ्रष्टाचार व्याप्त है। शिक्षा संस्थानों के लिये न पूरे भवन हैं,न शिक्षक हैं,न गैर शिक्षक कर्मचारी हैं,न प्रयोगशालाएं हैं,न शौचालय हैं,न पुस्तकालय हैं,पार्क हैं,न छात्रावास हैं तथा न ही परिवहन की पूरी व्यवस्था है। पहली बात तो शिक्षा और शोध के लिये बजट ही कम रखा जाता है, दूसरे जो बजट आता है उसका अधिकांश हिस्सा व्यवस्थापक और नेता खा जाते हैं। ऐसे में भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों को खोलने की अनुमति दे दी गई है। औपनिवेशिक मानसिकता से भारतीय शिक्षा पहले ही ग्रस्त थी,अब तो कानूनी रूप से औपनिवेशिक ताकतों को खुला आमंत्रण दे दिया गया है। यूरोपीयन और अमरीकन लोग व्यापारी लोग हैं।वो कोई सेवा करने के लिये भारत में विश्वविद्यालय नहीं खोल रहे हैं।उनका उद्देश्य रुपया कमाना और अपनी मजहबी मान्यताओं का प्रचार प्रसार करना है।विदेशी विश्वविद्यालय अपनी शर्तों पर काम करेंगे। भारतीय नेताओं के पास वैसे भी रीढ नहीं है।ये थोड़े से कमीशन के लिये कुछ भी समझौते कर सकते हैं। जिन्होंने श्रीराम मंदिर में चढावे और दानराशि तक को लूट लिया है, उनसे नैतिकता की आशा रखना महामूर्खता ही कहा जायेगा। भारत में 1000 से ऊपर विश्वविद्यालय हैं। इनमें उचित आर्थिक अनुदान की व्यवस्था करके निष्पक्षता और निष्ठा से काम क्यों नहीं करते हो? ध्यान रहे किसी राष्ट्र के जनमानस को गुलाम बनाने के लिये उसकी शिक्षा, उसके शिक्षक और उसकी शिक्षा नीति को काबू में कर लो- बस हो गया काम। भारत में शिक्षा व्यवस्था बिल्कुल ढह चुकी है। किसी भी स्तर पर प्रतिभा, अनुभव और ज्ञान को महत्व नहीं है।हर स्तर पर भ्रष्टाचार व्याप्त है।मुख्य परीक्षाएं नेताओं और अधिकारियों की निकम्मी औलादों को फायदा पहुंचाने के लिये पेपर लीक का शिकार हैं। भ्रष्ट और चरित्रवान नेताओं का लूटेरा गैंग शिक्षा माफिया बनकर अरबों खरबों कमा रहा है लेकिन शिक्षा व्यवस्था दिन प्रतिदिन बर्बाद होती जा रही है। विदेशी विश्वविद्यालय खोलने की बजाय खुद के विश्वविद्यालयों की दुर्दशा को सुधारना चाहिये। लेकिन इस सुधार के लिये प्रतिभाशाली, राष्ट्रभक्त, नैतिक और चरित्रवान नेताओं की आवश्यकता है।भारत में ऐसे लोगों का बेहद टोटा है।
8.)हरेक मजहब, संप्रदाय,मत और रिलीजन की अपनी पूजा- पद्धति, अपनी व्यवस्था, अपनी नैतिकता , अपने शास्त्र,अपनी जीवन-शैली और अपना दर्शनशास्त्र होते हैं। वैसे सही बात तो यह है कि मजहब में दर्शनशास्त्र वगैरह कुछ नहीं होता है। मजहब में तर्क,अक्ल, बुद्धि आदि बिल्कुल नहीं होते हैं। वहां पर कोरा अंधविश्वास होता है।भारत में पिछले आठ दशकों के दौरान सनातन धर्म के लिये विचित्र स्थिति पैदा हो गई है।सैक्यूलरवाद की आड़ में सभी मजहब अल्पसंख्यक दर्जा पाकर अतिरिक्त सुविधाएं ले रहे हैं। लेकिन सनातनधर्म क्योंकि कोई मजहब नहीं है और भारत में सनातनी बहुसंख्यक भी हैं। इसके बावजूद सनातनियों को भारत में मजहबियों जितने अधिकार प्राप्त नहीं हैं। सनातनियों के प्रति इस भेदभाव और मजहबियों के प्रति उदारता से सनातनियों में हीनता की भावना आती जा रही है। भारत में सबको समान अवसर प्राप्त हैं – यह बिल्कुल झूठ है। यहां पर अल्पसंख्यक तुष्टिकरण,मजहबी तुष्टिकरण और दलित तुष्टिकरण से वोट छीनकर सत्ता हासिल की जाती है।सत्ता के मुंह में सनातन का केवल नाम है लेकिन सत्ता के रोम -रोम में सनातन के प्रति वैर -भावना भरी हुई है।
9.) तथाकथित बड़े- बड़े विचारक, सुधारक, चिंतक, शिक्षक, नेता, धर्मगुरु, योगाचार्य और दार्शनिक जनमानस की भावनाओं को भड़काकर छोड़ देते हैं। चिंतन, सिद्धांत, विचारधारा, रहन- सहन, जीवन-शैली आदि के संबंध में जनमानस में महत्वाकांक्षा जगाकर उन्हें तड़पने के लिये छोड़ दिया जाता है।शासन- प्रशासन और व्यवस्था भ्रष्टाचार में पूरी तरह से डूबी हुई होने के कारण आधारभूत सुविधाएं भी नहीं मिल पाती हैं। यदि इसके विरोध में आवाज उठाओ तो सिस्टम तानाशाही से आवाज को दबा देता है। उपरोक्त तथाकथित बड़े लोगों के पास तो पहले ही विलासिता की सारी सुविधाएं मौजूद होती हैं। उन्हें कोई दिक्कत नहीं होती है। यदि सिस्टम उन पर कोई कार्रवाई करता है तो या तो वो रुपया फेंककर कार्रवाई से बच जाते हैं या फिर पाला बदलकर विरोधी खेमे में शामिल हो जाते हैं। कहने का आशय यह है कि क्रांति या बदलाव का फायदा मध्यमवर्ग को कभी नहीं हुआ है। अपितु सच यह है कि किसी भी क्रांति या बदलाव का सर्वाधिक फायदा निम्न वर्ग को और उच्च वर्ग को ही होता है। निम्न वर्ग को सरकार की तरफ से मुफ्त सुविधाएं मिल रही हैं तो उच्च -वर्ग को भ्रष्टाचार से सभी प्रकार के भोग -विलास उपलब्ध हो जाते हैं।विनाश होता है मध्यम वर्ग का।
10.) गजनवी,गौरी, चंगेज, नादिरशाह, बख्तियार, अकबर, औरंगजेब, कार्नवालिस, मैकाले हरेक कालखंड में मौजूद रहे हैं।कभी विदेशी हमलावरों के रूप में तो कभी स्वदेशी धार्मिक पोशाक और राष्ट्रवादी नारों की आड़ में।ये सदैव मौजूद रहे हैं।कहा जा रहा है कि विदेशी क्रूर हमलावरों ने भारत को लूटा और अपनी भूमि पर वापस लौट गये तथा कुछ नहीं भारत को ही अपनी कर्मभूमि के रूप में लूटभूमि बना लिया। लेकिन स्वदेशी धार्मिक राष्ट्रवादी लूटेरों ने 40 दिन में 70 बार श्रीराम मंदिर को लूटा है। बाकी तो कहा जा रहा है कि श्रीराम मंदिर के चंदे और दान की आड़ में सन् 1989 ईस्वी से ही लूटपाट चल रही है।सोचो कितना धन अब तक लूट लिया होगा। कितने हज़ार करोड़ रुपये अब तक लूटे जा चुके हैं इसका किसी के पास कोई हिसाब नहीं है। लूटेरों के पास तो पूरा हिसाब है लेकिन वो लूटेरे इतने शक्तिशाली और महान हैं कि बागेश्वर के धीरेंद्र शास्त्री और बृजभूषण जैसे लोग भी बोलने से भय खा रहे हैं। भारत विश्वगुरू से विश्वगरीब वैसे ही नहीं बना है। इसमें विदेशी और स्वदेशी दोनों प्रकार के लूटेरों ने भरपूर योगदान दिया है।
श्रीराम का भय तो उनको हो सकता है जो श्रीराम को मानते हों। लेकिन जिनके संस्कार और रक्त में ही अब्राहमिक मिशनरी विचारधारा घूम रही हो,वो श्रीराम या श्रीकृष्ण या शिवजी या हनुमान आदि किसी से नहीं डरते हैं। उदाहरण सबके सामने है।
11.) सावन के अंधों को सब कुछ हरा ही हरा दिखाई देता है।इस कहावत का न तो सावन से कोई संबंध है तथा न ही चौमासे से कोई लेना-देना है।यह कहावत तो अंधभक्तों के बारे में कही गई है। हमारे बुजूर्गों को मालूम था कि ऐसे बुद्धिहीन लोग भी भारत में पैदा होंगे,जो सनातन धर्म के मंदिरों, पवित्र नदियों, तीर्थस्थलों, महापुरुषों, गौमाता, श्रीमद्भगवद्गीता, स्वदेशी, स्वभाषा, स्वराष्ट्र आदि को पूरी तरह से बर्बाद करने वाले असुरों के प्रति अपनी बुद्धि के दरवाजे पर ताला मारकर अंधविश्वास करते रहेंगे। इतना बड़ा षड्यंत्र करने के बावजूद भी इन्हें इन राक्षसी लूटेरों पर संदेह नहीं होगा। श्रीराम मंदिर की आड़ में हजारों करोड़ रुपये के चढ़ावे,दान और सोने- चांदी- हीरे की ईंटों का भ्रष्टाचार करने वालों के प्रति इन्हें तनिक भी विरोध करने का मन नहीं होगा। गौमाता की जय बोल सत्ता हासिल करके भारत को गौमांस के निर्यात में शिरोमणि बनाने पर इन्हें कोई आश्चर्य नहीं होता है। श्रीमद्भगवद्गीता की आड़ में राजनीति करके इस ग्रंथ को सड़क छाप नावल बना देने वाले व्यापारी गीतानंदों,ज्ञानानंदों, गीता- मर्मज्ञों के धर्मविरोधी आशय पर इन अंधभक्तों को कभी भी संदेह नहीं होता है।यही है वो सावन के अंधे। इन्हें चैत्र से लेकर फाल्गुन तक किसी भी महीने में दिखाई नहीं देता है। यानी वर्ष -भर ये गधे के गधे ही बने रहते हैं। किसी भी महीने में इनकी बुद्धि काम नहीं करती है।यही है वो सावन के अंधे जो लाखों की संख्या में सत्ताधारी नेताओं की रैलियों, कथाकारों की कथाओं और धर्मगुरुओं के सत्संग रुपी हुड़दंगों में में बैठे मिलते हैं।
12.)जो लोग आमने-सामने की लड़ाई लड़कर विजय प्राप्त करते हैं,उनकी काफी ऊर्जा और जन-धन का विनाश होता है। लेकिन जो लोग चालाक और धूर्त हैं,वो आमने-सामने की लड़ाई लड़ने से बचते हैं।या यदि थोडे कम बेवकूफ हुये तो फिर वो दूसरे देशों की धरती पर लड़ाई लड़ते हैं। धूर्तता में अव्वल देश छल,कपट और धोखाधड़ी से लड़ाई लड़ते हैं।पीठ पीछे से वार करते हैं।अपनी जमीन पर वो कभी लड़ाई की आंच नहीं आने देते।चीन और अमेरिका इसके ज्वलंत उदाहरण हमारे सामने हैं।आज चीन कहां पर खड़ा है, सबको पता होना चाहिये। चीन ने विकास और समृद्धि में अमरीका और रुस को भी पीछे छोड़ दिया है। भारत का हजारों वर्षों का वीरता और समृद्धि का इतिहास रहा है। लेकिन आजादी के पश्चात् भारत को उचित मार्गदर्शन करने वाले नेता,प्रशासक, सुधारक, धर्माचार्य, योगाचार्य,शिक्षक और वैज्ञानिक नहीं मिले। इसका यह अर्थ नहीं है कि भारत में इनकी कमी है।भारत में प्रतिभाओं की कभी भी कमी नहीं रही है। लेकिन आजादी के पश्चात् के कालखंड में भारतीय प्रतिभाओं को कोई सम्मान और अवसर उपलब्ध नहीं हुये। भ्रष्टाचरण, कालाबाजारी, भाई-भतीजावाद ,रिश्वतखोरी और औपनिवेशिक पिछलग्गूपन ने भारत को खोखला कर दिया है।
13.) कोई कितना भी विरोध करे या आध्यात्मिक होने का दिखावा करे लेकिन लोकायत और चार्वाक सदैव प्रासंगिक रहे हैं। किसी भी कालखंड में इनकी प्रासंगिकता कम नहीं हुई।समकाल में इनकी प्रभुता,महत्ता और सत्ता भारत के हर सिस्टम में वर्चस्व स्थापित किये हुये है। राजनीति, धर्म, अध्यात्म, साधना, योगाभ्यास, चिकित्सा, खेती-बाड़ी, शिक्षा आदि हरेक क्षेत्रों में लोकायत और चार्वाक का दर्शनशास्त्र कार्यरत है।लोग कुछ भी, कैसे भी और कभी भी भौतिक सुख सुविधाओं के पीछे पागल हैं। जनसाधारण को तो छोड़ ही दो क्योंकि उनकी समझ इतनी गहरी नहीं होती है। यहां तो सनातन धर्म और संस्कृति से संबंधित बड़े बड़े मंदिरों, आश्रमों, पूजास्थलों, तीर्थस्थलों पर पदासीन बड़े लोगों ने भ्रष्टाचार, लूटपाट और शोषण के रिकार्ड तोड़ दिये हैं। सनातन धर्म और संस्कृति के सरकारी धर्माचार्यों, गुरुओं, पुरोहितों, पुजारियों, संन्यासियों, स्वामियों, कथाकारों और योगियों ने अपने धार्मिक स्थलों को भी भ्रष्टाचार, लूटपाट और शोषण के अड्डे बना दिया है। सरकारी धर्मगुरु, महामंडलेश्वर, कथाकार, पुरोहित और शंकराचार्य खड़े कर दिये गये हैं तथा सनातन धर्म और संस्कृति के वास्तविक लोगों को परे फेंक दिया है। कोई जांच नहीं, कोई कानून नहीं, कोई कार्रवाई नहीं।जब अपने लोग भ्रष्टाचार में डूबे हुये ह़ों तो कानून, संविधान, न्यायालय, पुलिस सब एक तरफ फेंक दिये जाते हैं।
14.) ध्यान रहे कि हर किसी को आप समझा नहीं सकते तथा हर कोई आपको समझ भी नहीं सकता है।ये दुनिया इतनी विचित्र और बदसूरत के साथ खूबसूरत है कि यहां पर कुछ भी होने की संभावना मौजूद रहती है।आप जितना भी संवेदनशील होते जाओगे,उतना ही आपको लगने लगेगा कि आपको कोई समझ नहीं रहा है। सभी आपकी अवहेलना कर रहे हैं। सभी आपको अपमानित कर रहे हैं।कुछ लोगों की समझने की शक्ति कम होती है तो कुछ लोग जानबूझकर दूसरों को अपमानित करने के लिये दूसरों को समझने का प्रयास ही नहीं करते हैं।ऐसा करके भी वो दूसरों का अपमान ही कर रहे हैं। अधिकांश व्यक्ति यह चाहते हैं कि दूसरे उनकी हरेक बात को सुनें, समझें, वाहवाही करें तथा उसको आचरण में स्थान दें। लेकिन ऐसे व्यक्ति स्वयं न तो किसी को सुनेंगे,न समझेंगे,न वाहवाही करेंगे तथा आचरण में कोई सुधार करेंगे। इसलिये इस बात को पल्ले गांठ बांध लें कि आप अपने भीतर की पीड़ा किसी को नहीं समझा सकते हो। दूसरे, किसी को भी आपकी पीड़ा को सुनने की फुर्सत नहीं है।अपनी समस्याओं से ही लोग परेशान रहते हैं। ऐसे में दूसरों की बातों को सुनने, समझने,उनकी प्रशंसा करने तथा उन्हें अपने आचरण में उतारने का कोई प्रश्न नहीं उठता है।कुछ अपनी तकलीफ कम हो तो दूसरों की तकनीफ सुनें।
15.) भारत भी अजीब तरह के पाखंडी लोगों से घिरा हुआ है।जो तथाकथित धर्मगुरु बलात्कार, हत्या और देशद्रोह जैसे अपराध में सजा काट रहे हैं,वो भी अपने अंधानुयायियों को चरित्र,आचरण, नैतिकता, सात्विकता और धार्मिकता का पाठ पढा रहे हैं।जो खुद अनेक बिमारियों की चिकित्सा एलोपैथिक चिकित्सकों से करवा रहे हैं,वो भी अपने मूढ़ अंधभक्तों की कैंसर, गठिया, मधुमेह, माइग्रेन, अस्थमा जैसी बिमारियों की चिकित्सा अपनी दिव्य शक्तियों से करने का दावा कर रहे हैं। जिनके निजी जीवन में मामूली भी शांति, संतुष्टि, संतुलन और संतोष नहीं है,वो अपने गोबर भक्तों को हवाई जहाज से सीधे सतलोक में ले जाने का प्रलोभन दे रहे हैं। और आश्चर्य देखिये कि जनमानस के साथ साथ पुलिस अधिकारी, प्रशासनिक अधिकारी और नेता लोग उनके चरणों में लोटपोट हो रहे हैं। धार्मिक आजादी की आड़ में इस प्रकार के पाखंड चल रहे हैं। सेक्यूलरवाद की आड़ लेकर इस प्रकार की आध्यात्मिक लूटपाट सरेआम चल रही है।जो हरियाणा कभी राष्ट्रवादी और तार्किक संगठन आर्यसमाज का गढ़ हुआ करता था,आज वहां पर पाखंड, ढोंग, शोषण, झाड़-फूंक,टोने- टोटके और चमत्कारी नामदान की आंधी आई हुई है। स्वयं आर्यसमाजी पौराणिक संघिष्ट बनकर अपनी तिजोरियां भरने में लगे हुये हैं। श्रीराम मंदिर की आड़ में चल रही लूट-पाट के संबंध में किसी तथाकथित प्रसिद्ध आर्यसमाजी आचार्य, स्वामी, संन्यासी और पदाधिकारी का वक्तव्य पढ़ने को नहीं मिला है।
16.)पूर्वाग्रहग्रस्तरहित होकर निष्पक्ष लेखन आज लुप्त होता जा रहा है और पूर्वाग्रहग्रस्त होकर लेखन करना व्यक्ति,समाज, राष्ट्र, धर्म, संस्कृति, अध्यात्म, राजनीति आदि हरेक क्षेत्र के लिये पथभ्रष्ट करने वाला सिद्ध हो रहा है। किसी राजनीतिक या आर्थिक या सांप्रदायिक विचारधारा से बद्ध होकर लिखना सीमित क्षेत्र के लिये लाभकारी लेकिन स्वार्थपरक हो जाता है।ऐसा लेखन अधिक लोगों का हित करने में अक्षम होता है।बस ,एक दार्शनिक की यही खूबी होती है कि उसका लेखन तर्क और आस्था दोनों में संतुलन साधते हुये आगे बढ़ता है। किन्हीं पूर्व-निर्धारित उन धारणाओं और विश्वासों से आबद्ध होकर लिखना,जो पाखंड, ढोंग और शोषण का कारण बन रही हैं, वास्तव में लेखन है ही नहीं। इससे अच्छा तो यह हो कि लिखा ही न जाये।भारत में स्तरीय लेखन के ह्रास का कारण यही तो है कि लेखक अपने चहुंओर के परिवेश, नैतिकता,समस्याओं, संवेदनशीलता, भौतिक आवश्यकताओं से दूरी बनाकर किन्हीं संकुचित मजहबी, राजनीतिक या आर्थिक धारणाओं से ग्रस्त होकर लेखन करते हैं। किन्हीं के हितचिंतक बनकर लिखना और बहुसंख्यक की अवहेलना करते जाना साहित्य में दयनीय स्थिति का कारण बन गया है।वैचारिक स्वतन्त्रता का दमन भी एक विचारणीय मुद्दा इसीलिये यह भी आवश्यक हो जाता है।कुछ के हित के लिये बहुतों के अधिकारों का गला घोंट देना और फिर बोलने भी नहीं देना -?जहा भी कुछ व्यक्ति, समाज, राष्ट्र, धर्म और संस्कृति के प्रतिकूल लगे, उसे बेपरवाह होकर लिखना चाहिये। स्वांतसुखाय,परांतसुखाय लिखते रहना चाहिये।न अध्यात्म गलत
है,न धर्म गलत है,न विज्ञान गलत है,न प्रकृति गलत है — इन पर व्यक्ति का एकाधिकार गलत है।इन पर स्वयं को थोपते जाना गलत है।इन पर खुद को ही सही कहते जाना गलत है।निज का मत बतलाओ और अन्यों की भी सुनो- यह आवश्यक है। मैंने उपरोक्त में से किसी को भी आज तक गलत नहीं कहा है।गलत कहा है उपरोक्त की आड़ में अपनी आजीविका और विलास चाहने वालों को।साहित्य, विज्ञान, धर्म, अध्यात्म,योग, शिक्षा आदि का कोई भी अध्येता संपूर्ण नहीं है।चित्त में विकार कम या अधिक सबमें मौजूद हैं।
कोशिश रहती है कि वह सिर



