साहित्य

खुद तक लौटने का सफर

सौ, भावना मोहन

दुनिया की भीड़ में मैं,

खुद को खोती जा रही थी।

दूसरों को खुश करने के लिए,

खुद को मारती जा रही थी।

 

दिल की कब्रगाह में मैंने,

जिंदा दफन किया सपनों को।

खुद को जख्म देकर भी,

खुश करती रही बस अपनों को।

 

समय के बहाव ने फिर मुझे,

ऐसे मोड़ पर लाकर खड़ा किया।

जहां मैंने देखा खुद को,

और भीतर लौटने का रुख किया।

 

खुद तक लौटने का मेरा सफर,

मेरी झोली में खुशियों को भर गया।

जब से अपने लिए जीने लगी मैं,

सारा जीवन मेरा जैसे संवर गया।

 

सौ, भावना मोहन विधानी ✍️

अमरावती महाराष्ट्र।

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