
फिर भी पूरे जहां का हिसाब रखता है
सब जगह मौजूद है मगर दिखता नहीं
जाने किस तरह का हिजाब रखता है
पूरी दुनिया नचाता है अपने इशारे पर
हवा में टांग कर आबताब रखता है
गिनती की सांसे मिली है आदमी को
मगर वह इच्छाएं बेहिसाब रखता है
नियत करता है वह नियति के लिए
वह फिर क्यों नियत खराब रखता है
आंखें जरूरी नहीं उसे देखने के लिए
जिसे देखने का यूं ही ख्वाब रखता है
कुछ समझाने के लिए दिखाएं है नजारे
कीचड़ में कमल कांटों में गुलाब रखता है
पंडित पुष्पराज धीमान भुलक्कड़
गांव नसीरपुर कला हरिद्वार उत्तराखंड



