
चेहरे पे चेहरा लगा कर लोग,
रोज़ मिलते हैं बाज़ार में।
हंसी होंठों पर, दर्द आँखों में,
सच छुपा लेते किरदार में।
कोई मीठी बातों का जादूगर,
भीतर रखता है काँटे।
कोई अपनों सा दिखता है,
पीठ पीछे करता घाते।
आईना भी अब सच नहीं बोलता,
चेहरे बदलते पल में।
रिश्तों की भी परिभाषा बदली,
मतलब के इस हलचल में।
कभी खुद से पूछो ऐ इंसान,
कितने चेहरे हैं तेरे पास।
एक वो जो दुनिया को दिखे,
एक वो जो है तेरे साथ।
सच्चा चेहरा वही है अपना,
जिसमें न कोई बनावट हो।
चेहरे पे चेहरा नहीं,
दिल में बस सच्चाई की चाहत हो।
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ममता झा मेधा
डालटेनगंज




