परे है भाग्य की लकीरों से,
लिखी जाती इबादत पसीनो से।
जलाकर खुद को धूप में,
जागते रातों में अनकय से।
जहां हाथों में होते छाले,
अंधेरों को चीरते मुकद्दर से।
उगा देते उम्मीदों से सूरज,
नहीं महलों की मीनारों से।
कर्म ही बोलते सदा उनके,
बहाने बस भाग्य के ही होते।
धुरी कर्मठता की रखते ,
नहीं मतलब कभी भी ठहरने से।
माटी में सोये हुए जो बीज,
नहीं रखते गिला किस्मत से।
पाल कर हृदय में उम्मीद,
करते नव सृजन आशाओं से।
मीना तिवारी
पुणे




