
गुमनाम जिंदगी को मशहूर कर दिया,
दिल के अंधेरे कोने में इक नूर भर दिया।
तनहाई में जो कटती थी, रातें उदास सी,
उल्फत ने तेरी उनको भी, मखमूर कर दिया।
राहे सफर का कोई भी, नक्शा ने पास था,
नज़रे करम ने चलने में, भरपूर कर दिया।
बाज़ार में जिसकी कोई, कीमत नहीं थी कल,
उस पत्थर को तराश कर मशहूर कर दिया।
सीने में जो छुपाए थे, वो जख्म ए-आरजू,
तेरी छुअन ने पल में उन्हें काफूर कर दिया।
रुसवाईयां जो वक्त ने बख्शी थी राह में,
उनको भी तेरी दीद ने मसरूर कर दिया।
हैरान है ये देखकर, सब अहले अंजुमन,
जर्रे को तूने रश्के, कोहिनूर कर दिया।
भटका किया जो राहों में, अक्सर ही दर-ब-दर,
“आकाश” को सलीका वो भरपूर कर दिया।
पंडित मुल्क राज “आकाश”
गाजियाबाद उत्तर प्रदेश



