साहित्य

लूट गये साहित्य के बाजार में

जयचन्द प्रजापति

मुझे एक साहित्यिक सम्मेलन में मुख्य अतिथि के तौर पर आमंत्रित किया गया। पहली पर ऐसा साहित्यिक स्नेह मिलने से मैं गदगद हो गया। हृदय में नई-नई भावनायें बादलों की तरह उमड़ने- घूमड़ने लगी। मन मष्तिष्क सातवें आसमान में सैर करने लगा। अब महसूस हुआ कि साहित्यकारों की श्रेष्ठ श्रेणी में पहुँच गया हूँ।

 

बालों की कटाई-छंटाई नाई से करवाई। बाल पकने से उम्र कम दिखे। इसके लिए हेयर डाई लगवाई। पुराना जूता फट गया था। मोची से मरम्मत कराई। क्रीम पाउडर भी मंगवा लिए थे। लगना चाहिए था कि मैं एक मुख्य अतिथि के तौर साहित्यिक सम्मेलन में साहित्यिक भाव मेरे रोम-रोम में भरा पड़ा है। कुर्ता-धोती नील से रंग लिया था।

 

सुना था कि मुख्य अतिथि जो बनता है उसके उपर पैसों की बौछार होती है। ज्यादा पैसे गिरने की उम्मीद से खादी का एक झोला भी खरीद लिया था ताकि पैसे की बारिश होते ही झोले में सब भर लूं। जिंदगी में जो नासूर भरा पड़ा है। वह ठीक हो जायेगा। तरक्की के रास्ते खुल जायेंगे।

 

कार्यक्रम की तैयारी हो गयी। हम भी शाही अंदाज में जैसे ही पहुंचे। लोगों ने फूल माला से लाद दिया। जय-जयकार अपना सुनकर महसूस हुआ कि कलयुग का देवता मैं ही हूँ।साहित्य से भरपूर हो गया हूँ।

 

मंच पर जैसे ही खड़ा हुआ। तालियों से पूरा पंडाल गूंज गया। प्रत्येक साहित्यकारों की तारीफ करना था। एक-एक साहित्यकारों की तारीफों के पूल बांधना शुरू कर दिये। शानदार शब्दों से ऐसा नहलाया कि सारे उपस्थित साहित्यकार मस्त हो गये। झूठे-झूठ तारीफ खूब झोंका। पूरी महफ़िल झूठे झूठ खुश हो गयी। नोटों की बरसात हो गयी। खादी का झोला भर गया। कार्यक्रम खत्म हो गया।

 

इतना पैसा जिंदगी में नहीं देखा था। झोला को पूरी मुस्तैदी से दबोच रखा था। आंधी रात थी। डर था। किसी की नियत खराब हुई तो झोला हाथ से निकल जायेगा। ईश्वर की कृपा है। अब समझ आया की साहित्यिक दुनिया में पैसों का जलवा है जैसे घर पहुंचे। दरवाजा बंद किया। जल्दी से झोला खोला, देखा तो मेरे अंदर का साहित्यिक रंग फीका हो गया। नोटों पर लिखा था चिल्ड्रेन बैंक। हम तो लूट गये साहित्य के बाजार में।

 

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जयचन्द प्रजापत ‘जय’

प्रयागराज

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