
स बेचारी कई दिनों से परेशान थी। उसने अपनी बहू से सिर्फ इतना कहा था कि थोड़ा घर के कामों में हाथ बंटा दिया करे। लेकिन बहू ने बात को समझने के बजाय गुस्से में जवाब दिया,
“मैं किसी की नौकरानी नहीं हूं जो सबको हाथ में खाना दूं। खाना बना कर रख दिया है, जिसे खाना है खुद ले ले।”
यह कहकर वह मोबाइल लेकर अपने कमरे में चली गई।
सास ने भारी मन से कहा,
“छोटी बहू मायके गई है, आने में अभी समय लगेगा। थोड़े-बहुत काम मैं भी कर लेती हूं बहुरिया, लेकिन घर में रोज़ का क्लेश अच्छा नहीं लगता। पहले तुम्हारा देवरानी से भी झगड़ा होता था। मैं तो दो-तीन महीने बाद तुम्हारे ससुर जी के पास चली जाऊंगी, लेकिन तब तक घर में शांति रहे तो अच्छा लगेगा।”
फिर उसकी आंखें नम हो गईं।
“तुम्हारी वजह से मेरा मन बहुत दुखी रहता है। कभी-कभी तो अपना दुख दूसरों के घर जाकर कहना पड़ता है। एक तरफ मम्मी जी-मम्मी जी कहती हो और दूसरी तरफ बातों से दिल दुखा देती हो।”
“तुम पढ़ी-लिखी और समझदार हो। आज तक मैंने किसी को कुछ नहीं कहा। तुमने अपनी पसंद से शादी की, फिर भी मैंने तुम्हें बेटी समझकर अपनाया।”
लेकिन सास की बातों का बहू पर कोई असर नहीं हुआ। उसने झुंझलाकर दरवाज़ा बंद किया और मोबाइल में व्यस्त हो गई।
उस शाम सास का सिर दर्द से फटा जा रहा था। वह आंगन में चुपचाप बैठी थी। चेहरे पर उदासी साफ दिखाई दे रही थी। तभी सामने वाली एक महिला अपने बच्चों के साथ पार्क में आई। उसने सास को देखा और पास आकर पूछा,
“क्या बात है आंटी जी? आज बहुत परेशान लग रही हैं।”
बस फिर क्या था…
कई दिनों से मन में दबा दर्द आंखों के रास्ते बाहर आ गया। सास ने अपनी सारी व्यथा सुना दी।
“जब से बहू शादी करके आई है, घर में लड़ाई-झगड़ा और तनाव ही रहता है। पिछले पंद्रह दिनों से तो ठीक से बात भी नहीं करती। समझ नहीं आता क्या करूं।”
महिला ने उसकी बात ध्यान से सुनी और फिर मुस्कुराकर बोली,
“आंटी जी, कुछ लोगों का स्वभाव ही ऐसा होता है। आप हर बात को दिल से लगाना छोड़ दीजिए। जब वह गुस्सा करती है, तो वह उसकी आदत है, आपकी गलती नहीं।”
फिर उसने प्यार से कहा,
“अब अपनी खुशियों के बारे में सोचिए। थोड़ा घूमिए-फिरिए, मंदिर जाइए, भजन-कीर्तन में समय बिताइए। जिंदगी के इस पड़ाव में मन की शांति सबसे जरूरी होती है।”
ये बातें सास के दिल को छू गईं।
वह मुस्कुराते हुए बोली,
“बेटी, आज तुमसे बात करके मन हल्का हो गया। कई दिनों बाद ऐसा लग रहा है जैसे दिल को सुकून मिला हो।”
अगले दिन से उसने खुद को बदलने का फैसला कर लिया।
अब वह सुबह घर का काम निपटाती, फिर मोहल्ले की महिलाओं के साथ बैठकर हंसी-मजाक करती। शाम को मंदिर में भजन-कीर्तन में जाने लगी। अपने छोटे पोते को भी साथ ले जाती।
धीरे-धीरे उसका मन फिर से खिलने लगा।
बहू का स्वभाव तो नहीं बदला, लेकिन सास ने अपनी जिंदगी को दुख के सहारे जीने के बजाय खुशियों के साथ जीना सीख लिया।
उसे समझ आ गया था कि हर रिश्ते को बदलना हमारे हाथ में नहीं होता, लेकिन अपने मन को संभालना हमेशा हमारे हाथ में होता है।
कभी-कभी सबसे बड़ी जीत सामने वाले को बदलने में नहीं, बल्कि खुद को संभाल लेने में होती है।
सपना कुमारी, कोल्हापुर



